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दुनिया

जर्मनी को संभालना मैर्केल के लिए मुश्किल हुआ

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दुनिया के नेताओं से आगे दिखने वाली जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल इस वक्त अपने देश में कठिन समय का सामना कर रही हैं. गठबंधन सरकार पर बातचीत टूटने के बाद उनके सामने अपनी सत्ता बचाए रखने की चुनौती है.

12 साल तक यूरोपीय संघ की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को थामे रहने के बाद दुनिया की सबसे ताकतवर महिला के सामने उनके आखिरी कहे जा रहे कार्यकाल में आकस्मिक चुनाव का सामने करने की आशंका है. जर्मनी की प्रमुख समाचार पत्रिका श्पीगल ऑनलाइन ने लिखा है, "चांसलर के रूप में 13वें साल में प्रवेश करने जा रहीं मैर्केल जर्मनी में प्रशंसा की नजरों से देखी जाती हैं लेकिन घर में उनका आदर घट गया है." चुनाव में सहयोगियों के साथ उनकी पार्टी को 30 फीसदी वोट मिले. लंबे समय से अडिग बनी रही चांसलर मैर्केल के सहयोगी आप्रवासन नीति को लेकर उनके साथ नहीं है. उनका मानना है कि इन नीतियों के कारण ही जर्मन राजनीति में उग्र दक्षिणपंथियों का उभार हुआ. मैर्केल चौथी बार चुनाव में तो जीत गईं लेकिन इसी चुनाव में उग्र दक्षिणपंथी एएफडी को भी लाखों वोट मिल गये. दूसरे दलों के साथ गठबंधन बनाने की मैर्केल की कोशिश नाकाम हो गयी है. अब जर्मनी में भारी अनिश्चितता और महीनों की राजनीतिक कशमकश की स्थिति है जिसे सजग और सुदृढ़ मैर्केल सख्त नापसंद करती हैं.

मैर्केल को पद छोड़ना भी पड़ सकता है लेकिन बहुत कम ही लोग ऐसा सोच रहे हैं और इसके पीछे वजह है बीते सालों में उनके हाथों कई संकटों का समाधान. अपने लंबे शासन में मैर्केल को यूरोप की "किफायत की महारानी" और शरणार्थियों का मसीहा कहने के साथ ही "मुक्त दुनिया की नेता" कहा जाने लगा है. ट्रंप, ब्रेग्जिट और दूसरे अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों के सामने 63 साल की अंगेला मैर्केल चट्टान की तरह डटी रहीं और साथ ही देश में विकास और बेरोजगारी की दर को भी संभाला. 2005 में सबसे कम उम्र की और पहली महिला चांसलर बनने वाली मैर्केल को जर्मनी के लोग बनाए रख कर आभार जताते रहे. उनके समकालीनों में जॉर्ज डब्ल्यू बुश, टोनी ब्लेयर और जैक्स शिराक भी रहे हैं. मैर्केल ने अपने व्यवहारिक, विनम्र और सौम्य व्यवहार से ऐसे लगता है कि बदलाव की बजाय स्थिरता को पसंद करने वाले इस अमीर और बुजुर्गों के देश की सत्ता में बने रहने का गुर जान लिया है.

हालांकि इस बार की मुश्किल थोड़ी अलग है. गठबंधन की बातचीत टूट गयी है और जर्मनी राजनीतिक संकट में घिरा है. मुमकिन है कि जर्मनी में फिर से चुनाव करना पड़े. कारोबारियों की पसंद मानी जाने वाली फ्री डेमोक्रैटिक पार्टी ने कई हफ्तों तक चली बातचीत के बाद गठबंधन की कोशिश से खुद को बाहर कर लिया है. एफडीपी का कहना है की उनके बीच जो मतभेद हैं वो सुलझाये नहीं जा सकते. थकी हारी दिख रहीं मैर्केल ने कहा है कि वह कार्यकारी चांसलर बनी रहेंगी और राष्ट्रपति फ्रांक वाल्टर श्टाइनमायर से मिल कर यह तय करेंगी कि आगे कैसे बढ़ना है.

बातचीत का टूटना जर्मनी को दूसरे विश्वयुद्ध के युग के बाद एक अभूतपूर्व दौर में ले आया है जिसमें मैर्केल या तो अल्पमत की सरकार बनाएंगी या फिर राष्ट्रपति नए चुनाव का एलान करेंगे. हालांकि कई लोगों को उम्मीद जता रहे हैं कि इतनी जल्दी दोबारा चुनाव नहीं होंगे और किसी एसपीडी के साथ बात बनाने की कोशिश हो सकती है. मैर्केल के सहयोगी जेन्स स्पाह्न ने कहा, "हमारे पास सक्षम कार्यवाहक सरकार है, जरूरी काम होते रह सकते हैं, घबराने की कोई वजह नहीं है. कुछ एसपीडी के नेता कह रहे हैं कि वो सरकार में शामिल होने को तैयार हैं."

एनआर/ओएसजे (रॉयटर्स, एएफपी)

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