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ब्लॉग

जरूरी है भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष

असम और गोवा की सरकारों का लुइस बर्गर रिश्वत कांड की जांच कराने का फैसला एकदम सही है. क्योंकि यह जांच ऐसे रहस्य खोलेगी जो अंतरराष्ट्रीय रिश्तों के पर्दे के पीछे की फाइलों में बंद है, कहना है महेश झा का.

न सीमापारीय कारोबार नई बात है और न ही इनमें दी जाने वाली रिश्वत. कहीं यह छुपा कर लिया जाता है तो कहीं इसे देना गैरकानूनी नहीं था, और कुछ पश्चिमी देशों में तो रिश्वत में दी गई रकम को टैक्स रिटर्न में शामिल कर टैक्स बचाना भी संभव था. लेकिन रिश्वतखोरी को सीमाओं में नहीं बांटा जा सकता, जो दूसरे देशों में रिश्वत देने को नहीं रोकेगा उसके लिए अपने यहां रिश्वतखोरी रोकना संभव नहीं. इसलिए पश्चिमी देशों की सरकारें पिछले सालों में न सिर्फ कानून बदल रही हैं, बल्कि सख्त रवैया भी अपना रही हैं. इसी का नतीजा अमेरिका का वह मुकदमा है जिसकी वजह से लुइस बर्ग का मामला सामने आया है.

अब भारत सरकार की यह पता करने में दिलचस्पी होनी चाहिए कि रिश्वत किसे मिली. क्या सचमुच किसी को रिश्वत दी गई या किसी का नाम लिखकर देने वाले ने उसे अपने खाते में कर लिया. सबसे बढ़कर ऐसे मामलों में अलग अलग प्रांतों में अलग अलग स्तरों पर फैसला लेने के बदले केंद्रीय भ्रष्टाचार विरोधी संस्था होनी चाहिए जो अपने आप इस तरह की खबरों पर नजर रखे और उसकी जांच करे. पारदर्शी प्रशासन के लिए भ्रष्टाचार से लड़ना बहुत जरूरी है.

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महेश झा

भ्रष्टाचार आदिकाल से चला आ रहा है और कोई भी देश पूरी तरह अछूता नहीं है. कहीं यह ज्यादा है तो कहीं कम और कहीं बहुत ही कम. इसकी वजह यह है कि लोग आम तौर पर इसे गंभीरता से नहीं लेते, क्योंकि इससे शारीरिक क्षति नहीं पहुंचती. बहुत से लोग इसे मामूली अपराध मानते हैं. अधिकारी खुद को गैरकानूनी या अवैध फायदा पहुंचाते हैं, तो प्रबंधक इसके जरिए कारोबार को बढ़ावा देना चाहते हैं या नौकरशाही बाधा को दूर करना चाहते हैं, जैसा लुइस बर्गर के मामले में कहा जा सकता है. रिश्वत देने वाले हों या लेने वाले, वे आलोचना और अपने जमीर की परवाह नहीं करते, वे कम संसाधन में अधिकतम कामयाबी चाहते हैं. उन्हें लगता है कि किसी को नुकसान नहीं हो रहा.

लेकिन नागरिक हों या उपभोक्ता, उन्हें हर हाल में नुकसान होता है. नागरिक उस प्रशासनिक अधिकारी को तनख्वाह दे रहे हैं जो उन्हीं को नुकसान पहुंचा रहा है. और कारोबारी रिश्वत देकर सामान या सेवा की लागत बढ़ा रहा है, उसकी भी कीमत नागरिकों को आखिरकार उपभोक्ता के रूप में चुकानी होगी. भारत में दुर्घटनाओं में होने वाली हजारों मौतों के लिए क्या खराब क्वालिटी की सड़कें जिम्मेदार नहीं हैं? क्या उन्हें हर स्तर पर होने वाली रिश्वतखोरी के कारण चीजों की ज्यादा कीमत नहीं चुकानी पड़ती?

भले ही भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों ने बहुत मदद नहीं की है, लेकिन उन्हें बनाना, लगातार सुधार करना और उनपर सख्ती से अमल करना जरूरी है. सबसे बढ़कर भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल भी बनाना होगा, लोगों को जागरूक करना होगा, क्योंकि यह सीधे नुकसान न भी पहुंचा रहा हो, हमले या हत्या जैसा न हो, समाज को यह हर हाल में नुकसान पहुंचा रहा है. यदि डॉक्टर से इलाज करवाने के लिए, दफ्तरों में लाइसेंस लेने के लिए और स्कूलों में जगह लेने के लिए रिश्वत देनी पड़े, तो सरकार और लोकतंत्र पर किसे भरोसा रह जाएगा. इस भरोसे को मजबूत करने की जरूरत है.

ब्लॉग: महेश झा

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