जरा हट के हैं जैकी श्रॉफ | मनोरंजन | DW | 26.02.2013
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मनोरंजन

जरा हट के हैं जैकी श्रॉफ

सुभाष घई की फिल्म हीरो से रातोंरात शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचने वाले जैकी श्राफ अपने समकालीन अभिनेताओं से थोड़े अलग हैं. फिलहाल वह महाश्वेता देवी के उपन्यास पर बन रही बांग्ला फिल्म स्वभूमि की शूटिंग कर रहे हैं.

जैकी श्रॉफ मानते हैं कि अगर समकालीन अभिनेताओं की तरह उनके करियर का ग्राफ लगातार ऊपर की ओर नहीं बढ़ने का कारण यह है कि वो किसी को भी ना नहीं कर पाते हैं. इसी वजह से कई मौके उनके हाथ से निकल गए.  पेश हैं जैकी श्रॉफ से बातचीत के कुछ अंश

डॉयचे वेलेः आप लंबे अरसे बाद बालीवुड में दोबारा सक्रिय हुए हैं. इस चुप्पी की कोई खास वजह ?

जैकी श्रॉफः कुछ खास नहीं. जब जहां जो फिल्म मिली करता रहा. इस दौरान मैंने क्षेत्रीय भाषा की कई फिल्मों में काम किया. इनमें ऋतुपर्णो घोष की अंतरमहल जैसी फिल्में थीं.

आप इन दिनों हीरो की भूमिकाओं में नजर नहीं रहे हैं ?

इसकी वजह यह है कि कोई मुझे ऐसी भूमिकाएं ही नहीं देता. मुझे हीरो का किरदार निभाना पसंद है. लेकिन मैं देवदास, तीन दीवारें और यादें में निभाए गए किरदारों से संतुष्ट हूं.

क्या चरित्र भूमिकाओं से असंतोष नहीं होता ?

नहीं, मैं मुंबई की चाल में पला-बढ़ा हूं. वहां मैंने अपने लोगों को भी खोया है. जीवन के अनुभव ने मुझे सिखाया है कि कामयाबी और पैसों समेत सब कुछ बहुत ही क्षणिक होता है.

आपने हाल की कुछ फिल्मों में नए निर्देशकों के साथ भी काम किया है. यह अनुभव कैसा रहा ?

नए निर्देशकों के साथ काम करना अच्छा लगता है. उनकी सोच में काफी बदलाव आया है. नए निर्देशक नए-नए विचारों के साथ सामने आते हैं और उनसे काफी कुछ सीखने को मिलता है. नए लोगों से अलग-अलग मौकों पर नई-नई बातें सीखना एक अच्छा अनुभव है.

Jackie in Kolkata

कोलकाता में शूटिंग के दौरान जैकी श्रॉफ

आपने शुरूआत तो धमाकेदार की थी. लेकिन उसके बाद क्या हुआ ?

दरअसल, मेरी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि मैं किसी को ना नहीं कह सकता. इस आदत की वजह से मुझे अपने करियर में काफी नुकसान उठाना पड़ा है. पेशेवर फैसलों के मामलों में मैं बेहद संवेदनशील हूं. छोटी-मोटी फिल्मों के लिए हामी भर देने की वजह से कई बार बड़े बैनर की फिल्मों में काम करने का मौका हाथ से निकल गया है.

फिल्मों का चयन कैसे करते हैं ?

मैं अपने समकालीन अभिनेताओँ की तरह नहीं हूं जो पहले पैसा और फिर पटकथा देख कर फिल्में हाथ में लेते हैं. मैं ऐसी कोई तय प्रक्रिया नहीं अपनाता. मैं किसी निर्माता-निर्देशक को निराश नहीं कर सकता.जितना है बहुत है. एक बार में मैं एक ही फिल्म करता हूं. सलमान, शाहरुख और आमिर भी ऐसा ही करते हैं. फर्क यही है कि मैं अपने बजट में फिल्में करता हूं और वह लोग अपने बजट में. इसके अलावा उन लोगों के आसपास शोर मचा कर माहौल बनाने के लिए कुछ लोग हैं.

एक फिल्म में साईं बाबा की भूमिका निभाने के बाद अब आप 90 साल के सूफी संत के किरदार में नजर आएंगे ?

हां, इस तरह के अलग-अलग किरदारों को निभाने में मुझे मजा आता है. भूमिका चुनौतीपूर्ण हो तो काम करने में भी मजा आता है. मैं अपने काम का मजा लेता हूं. फिल्मों का चलना या नहीं चलना कई बातों पर निर्भर है. मैं तो अपना काम करते रहना चाहता हूं.

खाली वक्त में क्या करते हैं ?

मैं खाली वक्त में बुजुर्गों और फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों की सहायता करता हूं. अब बहुत से लोग और संगठन गंभीरता से यह काम कर रहे हैं. फुटपाथ के बच्चों व बुजुर्गों की सहायता के लिए समाज के हर तबके को आगे आना चाहिए.

इंटरव्यूः प्रभाकर, कोलकाता

संपादनः आभा मोंढे

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