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दुनिया

जरदारी तो रहे पर विरासत नहीं

सितंबर 2008 में जब आसिफ अली जरदारी राष्ट्रपति बने तब कम ही लोगों को भरोसा था कि वो अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे. उन्होंने कार्यकाल पूरा करने की चुनौती तो जीत ली लेकिन उनकी विरासत पर पाकिस्तान बंटा हुआ है.

राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है 2010 में संविधान में बदलाव. इसके जरिए वो पहले शासक बन गए जिसने अपनी मर्जी से सत्ता के कई सारे अधिकार प्रधानमंत्री और चार राज्यों को सौंप दिए. पाकिस्तान के राजनीतिक विश्लेषक हसन असकरी रिजवी जरदारी को अल्पमत सरकार और पारंपरिक विरोधियों के बीच सहयोग का श्रेय देते हुए कहते हैं कि उनकी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने, "लोकतंत्र और संघीय तंत्र को मजबूत करने के लिए संविधान में बदलाव किया." रिजवी के मुताबिक, "गठबंधन के अलग अलग सहयोगियों को साथ रखने में कामयाब होकर उन्होंने राजनीतिक मोर्चे पर अच्छा प्रदर्शन किया."

ऐतिहासिक बदलाव

संविधान में ऐतिहासिक 18वें संशोधन ने करीब 100 अनुच्छेदों को बदल डाला. इसमें 18 मंत्रालयों के अधिकार राज्यों को सौंप दिए गए और प्रधानमंत्री को सेना प्रमुख नियुक्त करने का अधिकार दे दिया गया. जरदारी के कार्यकाल ने देश में पहली बार एक लोकतांत्रिक सरकार से दूसरी लोकतांत्रिक सरकार के हाथ में सत्ता सौंपे जाने को भी संभव कर दिखाया. मई में हुए चुनाव के बाद देश में सत्ता की बागडोर नवाज शरीफ के हाथ में आ गई है.

हालांकि जरदारी के कार्यकाल में तालिबान चरमपंथियों के कारण सुरक्षा की स्थिति बेहद खराब रही, अर्थव्यस्था की हालत लचर है और देश के इतिहास में सबसे ज्यादा बिजली की कटौती रही है. जरदारी पर राजनीतिक स्थिरता के लिए भ्रष्टाचार को सहन करने का भी आरोप है. पाकिस्तान में पेशे से वकील और राजनीतिक जानकार बाबर सत्तार का कहना है कि सकारात्मक सुधारों के बावजूद जरदारी की विरासत नकारात्मक है. सत्तार के मुताबिक, "वह अपने समर्थकों में सहायता बांट कर बचे रहे और देश की अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया. वह चरमपंथ के मसले को हल करने में नाकाम रहे और आज खुद खतरे में हैं, हम सब इतने मायूस कभी नहीं रहे."

अदालत का सामना

जरदारी पर 1990 के दशक में मंत्री रहते भ्रष्टाचार के कई आरोपों में देश की अदालतों का सामना कर चुके हैं. उस वक्त उनकी बीवी बेनजीर भुट्टो देश की प्रधानमंत्री थीं. जरदारी को कई मामलों में दोषी भी करार दिया गया लेकिन स्विस कोर्ट का एक मामला 2007 तक नहीं सुलझ सका. 2007 में भुट्टो, और उस वक्त देश के राष्ट्रपति रहे मुशर्रफ के बीच समझौते के तहत इसे मामले को बंद कर दिया गया. 2012 में जजों ने प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को आदेश दिया कि वह स्विस कोर्ट पर इस मामलों को दोबारा खोलने के लिए दबाव बनाएं. जरदारी की पार्टी के सदस्य गिलानी ने इससे इनकार कर दिया. नतीजा यह हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पद से पटाने का आदेश दे दिया और फिर राजा परवेज अशरफ प्रधानमंत्री बनाए गए. उन्हें भी कोर्ट का आदेश न मानने पर अयोग्य करार देने की चेतावनी दी गई. रिजवी का कहना है, "यह एक अजीब सी बात थी कि सुप्रीम कोर्ट एक राष्ट्रपति पर विदेशी कोर्ट में मुकदमे चलाने के लिए दबाव बना रहा था, जिसके कारण उनका ध्यान राष्ट्रीय मुद्दों से हट गया."

जरदारी अब पद छोड़ने की तैयारी में है और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की नई सरकार की तरफ से नए राष्ट्रपति का नाम करीब करीब तय कर दिया गया है. नवाज शरीफ स्विस अधिकारियों को मुकदमा दोबारा शुरू करने के लिए पहले ही लिख चुके हैं. हालांकि सत्तार स्विस अधिकारियों के हवाले से बताते हैं कि इस मुकदमे की समय सीमा खत्म हो चुकी है.

सुरक्षा की चिंता

जरदारी अपने कार्यकाल में देश की सुरक्षा के लिए कुछ नहीं कर सके और अब खुद उनकी जान पर ही खतरा बना हुआ है. जरदारी को आतंकवादियों से धमकी मिल रही है और 10 जुलाई को कराची में उनके सुरक्षा प्रमुख को मार दिया गया. इसके तुरंत बाद से ही वो दुबई और लंदन के लिए रवाना हो गए. आधिकारिक तौर पर तो उनकी यात्रा बच्चों से मुलाकात के लिए बताई जा रही है लेकिन बहुत से लोग इसे सुरक्षा कारणों से जोड़ कर देख रहे हैं. राजनीतिक जानकार तो यह भी आशंका जताते हैं कि कार्यकाल पूरा होने के बाद वह विदेश में ही रहेंगे. इससे उनकी पार्टी को नुकसान हो सकता है. वैसे कुछ जानकारों का मानना है कि वो पाकिस्तान और सउदी अरब आते जाते रहेंगे और पार्टी की जिम्मेदारियां कुछ दूसरे नेताओं के कंधे पर भी डालेंगे.

एनआर/एएम(डीपीए)

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