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दुनिया

जयराम रमेश ने कान पकड़ कर माफी मांगी

भोपाल गैस कांड के बाद वहां फैले कचरे को गुपचुप तरीके से फेंकने के मामले में पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कान पकड़ कर माफी मांगी. भोपाल से 230 किलोमीटर दूर पीथमपुरा में फेंका गया था यूनियन कार्बाइड का 40 टन जहरीला कचरा.

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दिसंबर 1984 को हुए भोपाल गैस कांड का कुछ कचरा 2008 में हटाया गया. यह कार्रवाई 27 जून 2008 को रातों रात बड़े गुपचुप तरीके से हुए. जहरीले कचरे को पीथमपुरा की भट्टी में झोंक दिया गया. इसके बाद पीथमपुरा और उसके आस पास के गांवों में पानी प्रदूषित हो गया. मामले का खुलासा तब हुआ जब एक संसदीय जांच दल ने इलाके का दौरा किया.

इलाके की जनता सरकार की इस लापरवाही से भड़की हुई है. रमेश शनिवार को मध्यप्रदेश के दौरे पर पीथमपुरा पहुंचे. वहां उन्होंने सरकार की गलती के लिए सबके सामने कान पकड़कर माफी मांगी और कहा, ''एक मंत्री होने के नाते मैं स्वीकार करता हूं कि उस 40 टन कचरे को पीथमपुरा लाया जाना गलत था.'' आस पास के कई लोगों का कहना है कि जहरीले कचरे की वजह से उन्हें त्वचा की गंभीर बीमारियां हो गई हैं. मवेशियों की मौत के मामले भी सामने आए हैं.

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भोपाल गैस कांड की मार

लोगों के गुस्से को शांत करते हुए रमेश ने कहा कि 2008 में वह मंत्री नहीं थे लेकिन वह पर्यावरण मंत्री के पद पर हैं और इन गलतियों को सुधारेंगे. उन्होंने कहा, ''जो कुछ भी करना है वह पूरी पारदर्शिता के साथ किया जाएगा. मैं सार्वजनिक रूप से स्वीकार करता हूं कि गुपचुप तरीके से यूनियन कार्बाइड के कचरे को यहां लाना गलत था.'' रमेश ने पर्यावरण को हुए नुकसान के लिए भी एक समिति बनाने का आदेश दिया.

भोपाल गैस कांड को दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना कहा जाता है. दो-तीन दिसंबर की रात भोपाल में यूनियन कार्बाइड के प्लांट से जहरीली मिथाइल आइसोसायनेट गैस रिसी. देखते ही देखते 15 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो गई. कई लोग आज भी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं. दुर्घटना के 26 साल बाद भी जहरीले कचरे को लेकर सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठा पाई है. 350 टन कचरा आज भी हादसे वाले प्लांट के पास पड़ा हुआ है. इसमें से ज्यादातर कचरा अब भी जहरीला है.

रिपोर्ट: एजेंसियां/ओ सिंह

संपादन: एस गौड़

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