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मनोरंजन

जब पोप ने चौंका दिया लोगों को

पोप के ट्वीट ने दुनिया भर में हड़कंप मचा दिया. ज्यादातर इसी कशमकश में उलझे रहे कि इसका मतलब क्या है? बाकी इसकी वजह सोच रहे हैं. पोप का ट्वीट आते ही लोगों की प्रतिक्रियाओं की भी बौछार होने लगी.

पोप बेनेडिक्ट 16वें ने रविवार को लैटिन भाषा में ट्वीट करके सभी को चौंका दिया. लैटिन भाषा में यह अकाउंट दूसरी भाषाओं के मुकाबले सबसे नया है. माना जा रहा है कि इसके पीछे मकसद है कैथोलिक चर्च की प्राचीनतम भाषा यानि लैटिन को फिर से जिंदा करना. उन्होंने लोगों से अपील की है कि इस भाषा को 21वीं सदी में फिर से लोकप्रिय बनाएं.

पोप ने पिछले साल दिसंबर में स्पैनिश, इतालवी, पुर्तगाली, जर्मन, पोलिश, अरबी और फ्रैंच भाषाओं में ट्वीट किया था. लैटिन कैथोलिक चर्च की आधिकारिक भाषा है. इस भाषा में पोप का ट्वीट आते ही लोगों की प्रतिक्रियाओं की भी बौछार होने लगी. इन्हीं में से एक में कहा गया, "किसी को लैटिन में एक शब्द भी समझ नहीं आता."

क्या है पोप का संदेश

केम्ब्रिज विश्विद्यालय में पढ़ने वाले टेमर नावर इस ट्वीट का अर्थ बताते हैं, "ईश्वर हमसे ईसाई समुदाय में एकता की दिशा में क्या चाहता है? यही कि हम लगातार प्रार्थना करते रहें, न्याय करें, अच्छाई से प्रेम करें और उसके साथ विनम्रता से चलते रहें."

यह संदेश लैटिन भाषा में यदि कहा जाए तो कम शब्दों के इस्तेमाल से ज्यादा असरदार अंदाज में कहा जा सकता है. यही कारण है कि कई लैटिन प्रेमी प्राचीन रोम की इस भाषा को संजोए रखना चाहते हैं, जिसमें पोप बेनेडिक्ट 16वें सबसे आगे हैं. हालांकि अब यह भाषा लुप्त होती जा रही है. लैटिन से ही कई यूरोपीय उत्पत्ति हुई है.

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आईपैड पर ट्विटर इस्तेमाल करते पोप बेनेडिक्ट 16वें

पिछले साल नवंबर में पोप ने वैटिकन में रोमन गिर्जाघरों में और उसके बाहर भी संरक्षण विभागों की शुरुआत की थी. लैटिन के संरक्षण के लिए वैटिकन ऐसा शब्दकोष तैयार कर रहा है जिसमें आधुनिक इस्तेमाल के शब्द प्राचीन लैटिन में बताए जाते हैं.

ट्विटर पर पोप के लैटिन भाषा में सक्रिय अकाउंट पर 5,000 के करीब लोग उनसे जुड़े हुए हैं. जो कि उनके कुल 8 भाषाओं में सक्रिय उनके अकाउंटों में से सबसे कम है. अन्य भाषाओं में पोप के अकाउंटों पर 20 लाख से अधिक लोग पोप को फॉलो करते हैं.

क्यों है लैटिन पर जोर

रोम की प्राचीनतम भाषा इसाई धर्म की प्रारम्भिक प्रारंभिक भाषा मानी जाती है. किसी जमाने में पढ़ने पढ़ाने में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली लैटिन भाषा 60 के दशक में अपने उतार पर आई. माना जाता है यह तब हुआ जब चर्च में क्षेत्रीय भाषा के इस्तेमाल की छूट दी गई.

जानकारों के अनुसार लैटिन भाषा के जरिए ही ईश्वरीय संदेशों का सही अर्थ निकलता है. कई बार अनुवाद करने में बातों का मतलब बदल जाता है. इसलिए गलतियों से बचने के लिए लैटिन भाषा पर जोर दिया जाता रहा है. कैथोलिक चर्च इसी विचार के साथ लैटिन का दामन थामे रहना चाहता है जिससे कि कभी न बदलने वाले धार्मिक सिद्धांतों को कभी न बदलने वाली भाषा में ही समझा जा सके.

बोलचाल की अंग्रेजी या रोमन भाषाएं हमेशा बदलती रहने वाली भाषाएं मानी जाती हैं. इनमें जरूरत के हिसाब से फेर बदल कर लिए जाते हैं. इसके अलावा धार्मिक परम्पराओं से भी जुड़ाव भाषा के संरक्षण पर जोर देने की वजह है.

रिपोर्ट: समरा फातिमा (डीपीए/रॉयटर्स)

संपादन: ईशा भाटिया

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