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विज्ञान

जब दिल पर हमला हो

दिल के दौरे के बाद क्या होता है? कई बार मरीज के मस्तिष्क पर असर पड़ता है और कुछ ही घंटों में उसकी जिंदगी बदल जाती है. ऐसा क्यों होता है और ऐसा होने पर क्या किया जा सकता है.

दिल का दौरा, कभी भी, किसी को भी पड़ सकता है. ऐसे में पैर और हाथ मचलते हैं, बोलने में दिक्कत होती है और चेहरे की मांस पेशियां अकड़ जाती हैं. लेकिन इसके संकेत हमेशा सही तरह से समझ में आते. हैम्बर्ग विश्वविद्यालय के प्रोफेसर योआखिम रोएथर कहते हैं, "80 प्रतिशत लोगों को इशेमिक दिल का दौरा पड़ता है. इशेमिक यानी खून की मात्रा में कमी. ऐसे मौकों पर एक नस फंस जाती है और दिमाग में खून का बहाव कम हो जाता है. इससे दिमाग रुकने लगता है और दिमाग को दौरा पड़ता है." दिमाग में नस फटने से खून फिर मस्तिष्क के अंदर बहने लगता है जिससे काफी नुकसान पहुंच सकता है. दिल का दौरा पड़ने से करीब एक तिहाई मरीज अपाहिज हो जाते हैं.

Blutdruck

जर्मनी में शोध

केवल जर्मनी में सालाना दो लाख लोगों को दिल का दौरा पड़ता है. औद्योगिक देशों में मौत का सबसे बड़ा कारण दिल का दौरा ही है. भारत को देख लीजिए. आठ साल के भीतर वहां दिल के दौरों की संख्या दुगुनी हो गई है. मधुमेह, मोटापा, ब्लड प्रेशर और तनाव इसका बड़ा कारण है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिल के शोध को बढ़ावा देने की जरूरत है. रोएथर कहते हैं, "पिछले दस बीस सालों में जर्मनी में दिल के दौरे का इलाज बहुत बेहतर हुआ है. " रोएथर की क्लीनिक में हृदयरोगों पर बहुत शोध हो रहा है.

यहां के डॉक्टर कुछ ऐसे मामले भी देखते हैं जिनमें मस्तिष्क दिल के दौरे के बाद सूज जाता है और स्वस्थ हिस्सों पर दबाव डालता है. मरीज इस वजह से मर जाते हैं. रोएथर कहते हैं, "जर्मनी से कई शोध आ रहे हैं. इनसे पता तला है कि ऐसे मामलों में क्रैनीकटोमी होनी चाहिए, यानी मस्तिष्क के लिए जगह बनाई जानी चाहिए. इसके लिए खोपड़ी के ऊपरी हिस्से को निकाला जाता है. अगर सूजन तीन चार महीनों में कम हो जाती है तो इस टुकड़े को दोबारा लगा दिया जाता है. यह ऐसे शोध हैं जो जर्मनी में हो रहे हैं और यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानकों को भी बदल देंगीं."

बच्चों को भी दिल का दौरा

ज्यादातर पुरुषों को औसतन 70 साल की उम्र में दिल का दौरा होता है. महिलाएं ज्यादातर 75 साल की होती हैं जब उन्हें दिल का दौरा पड़ता है, लेकिन अब बच्चों को भी दिल का दौरा पड़ता है. जर्मनी में 300 बच्चे इसका शिकार बनते हैं. कुछ मामलों में मां के पेट में ही बच्चों को दिल का दौरा पड़ सकता है. कई बार पता भी नहीं चलता कि बच्चे को दिल का दौरा पड़ा है क्योंकि डॉक्टर भी बच्चों और शिशुओं को इस मर्ज से नहीं जोड़ते. बच्चों को दिल का दौरा पड़ता है ऑटोइम्यून बीमारियों की वजह से जिसमें मरीज के शरीर में कोशिकाएं अपने ही खिलाफ काम करने लगती हैं या खून बहुत गाढ़ा हो जाता है. बच्चों के मस्तिष्क में परेशानी कई सालों बाद पता लगती है.

कई सवाल

दिल के दौरे का मतलब है ऑपरेशन, इलाज में वक्त लग सकता है. कई मामलों में मरीज को लकवा हो जाता है, वह बोल नहीं सकते और जिंदगी भर उनका ख्याल रखना पड़ता है. अगर ऐसा नहीं भी हो तो भी आम जीवन में वापस लौटने पर मरीज को खूब ख्याल रखना पड़ता है, खाने को लेकर आदतें बदलनी पड़ती हैं, कसरत करनी पड़ती है और तनाव से बचना पड़ता है. जर्मन शहर गुएटर्सलोह में आंके सीबराट दिल के दौरे के मरीजों के सवालों का जवाब देती हैं. वह एर्गोनॉमिक थेरेपी करती हैं. "मरीजों को कई बार पता नहीं होता कि वह किस के पास जा सकते हैं और उनके सवालों का जवाब कौन देगा." सीबराट मरीजों के सवाल का जवाब देती हैं, जैसे कि क्या उन्हें अब अपाहिज प्रमाण पत्र की जरूरत होगी, क्या उन्हें नौकरी छोड़नी होगी, उन्हें किससे मदद मिल सकती है.

Hausengel Altenpflege

इस वक्त सीबराट 40 मरीजों की देखभाल कर रही हैं. इनमें से एक है डिर्क वेन्याकोब. उन्हें तीन महीने पहले दिल का दौरा पड़ा था लेकिन उनकी जान बच गई. उनके मस्तिष्क को कोई नुकसान नहीं पहुंचा, लेकिन उनका दाहिना हाथ और पांव प्रभावित हए हैं. "पहले कुछ हफ्तों तक मैं अपने दाहिने हाथ से लिख नहीं पाता था. मुझे सबकुछ दोबारा सीखना पड़ा."

सीबराट से उन्हें काफी मदद मिली. "बीमारी से आपको बहुत नुकसान होता है, आप ठीक तरह से सोच नहीं सकते और अगर आपकी इसमें कोई मदद करता है तो उससे काफी फायदा होता है." सीबराट डॉक्टरों से मिलने में मदद करती हैं, वह ध्यान रखती हैं कि मरीज अपनी दवाएं सही वक्त पर लेते हैं. उन्हें पता है कि अगर दूसरा दौरा पड़ा तो यह पहले दिल के दौरे से बुरा होगा.

अगर बीमारी का जल्दी पता चल जाए तो यह मरीज की मदद कर सकता है, लेकिन दिल के दौरे के बाद अस्पताल से मरीजों की मदद भी बेहद अहम है. सीबराट का यही मानना है, वह कहती हैं कि मरीजों का बीमारी के बाद ख्याल रखने में और लोगों को हिस्सा लेना चाहिए.

रिपोर्टः गुदरून हाइसे/एमजी

संपादनः एन रंजन

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