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जर्मन चुनाव

जब जर्मनी में हुई जबरन नसबंदी

जबरन नसबंदी सिर्फ भारत ही नहीं, जर्मनी में भी हुआ करती थी. हिटलर के वक्त के नाजी जर्मनी ने 1933 में हजारों लोगों की नसबंदी करा दी कि आनुवांशिक बीमारियों पर काबू पाया जा सके, जिनकी नसबंदी नहीं हुई, उन्हें मरवा दिया गया.

इसे लेकर आज ही के दिन यानी 14 जुलाई, 1933 को कानून पास किया गया. उस वक्त तक जर्मनी पूरी तरह से नाजी शासन की मुट्ठी में आ चुका था. ऐसी सत्ता, जो जर्मनी को बिलकुल अपने विचारों के आधार पर ढ़ालना चाहती थी. और इसी दिशा में उठाया गया कदम था यह कानून, जिसके तहत आनुवांशिक बीमारियों पर अंकुश लगाने के लिए लोगों की नसबंदी की योजना थी. जर्मन संसद ने इस पर मुहर लगा दी.

इस कानून के अमल में आने के बाद खास बीमारियों से पीड़ित लोगों की जबरन नसबंदी कराने का प्रावधान था ताकि ये बीमारियां अगली पीढञी में न जा पाएं. इस कानून के समर्थकों की राय थी कि इससे जर्मनी की आबादी दूसरे देशों से बेहतर हो सकती है.

जिन लोगों की नसबंदी कराई जाती थी, उन्हें बिना बच्चों के ही जीवन बिताना पड़ता था. कई लोगों को इससे इस कदर सदमा लगा कि वे जिंदगी के आखिरी पल तक परेशान रहे. हालांकि नाजियों की उम्मीद थी कि वे दुनिया के सामने "मास्टर नस्ल" ला सकते हैं, जो बीमारी और कमजोरी से दूर होगी.

इस कानून में उन बीमारियों का जिक्र था, जिन्हें आनुवांशिक माना गया था और जिसकी वजह से अगली नस्ल पर "असर" पड़ सकता था. इनमें पैदाइशी मानसिक रोगी, सिजोफ्रेनिया, मिर्गी, आनुवांशिक बहरापन या अंधापन और इसके अलावा अल्कोहल के आदी लोगों को भी शामिल किया गया था.

मेडिकल इतिहासकार क्रिस्टियाने रोथमालर ने इस कानून के बारे में लंबा रिसर्च किया है. उनका कहना है, "कोई यह नहीं कह सकता है कि यह सिर्फ नाजियों का फैसला था." उनके मुताबिक इस तरह की चर्चा 19वीं सदी में ही शुरू हो गई थी, "उस वक्त यह आनुवांशिक बायोलॉजी का बहुत गंभीर हिस्सा था. इसे पगलाए नाजियों ने नहीं शुरू किया था. ये तो डॉक्टरों की राय थी, जिन्होंने कानून का स्वागत किया. वे भी लंबे वक्त से इस तरह का सपना देख रहे थे."

उनके मुताबिक यह ऐसा सपना था, जिसमें "कमजोर तत्वों" को समाज से बाहर कर दिया जाना था.

इस कानून के अमल में आने के बाद डॉक्टरों ने हजारों संदिग्ध लोगों की नसबंदी कर दी. जन्म से ही दिमागी तौर पर बीमार लोगों को खत्म करने को सबसे ज्यादा न्यायोचित ठहराया गया. उन्हें आम समुदाय के बाहर "का निवासी" बताया जाता था. रोथमालर का कहना है, "वे आम तौर पर सामाजिक मदद पर निर्भर थे. इस वजह से अधिकारियों को उनकी फाइल के बारे में पता होता था और उसकी मदद से वे उनके बारे में सब कुछ जानते थे."

स्थानीय अधिकारियों ने पूरे जर्मनी में आनुवांशिक स्वास्थ्य अदालतों का गठन शुरू कर दिया. इनका काम जबरन नसबंदी पर फैसला लेना था. जूरी का प्रमुख एक जज होता था और दो डॉक्टर इसके सदस्य होते थे. मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर किसी भी नसबंदी को सही ठहराया जा सकता था.

रोथमालर का कहना है, "इतनी ज्यादा अपीलें होती थीं कि अदालत उन पर सुनवाई भी नहीं कर पाता था. शुरू में लोगों ने अदालती कार्रवाई में विश्वास किया. लेकिन बाद में इसमें काफी वक्त लगने लगा और पूरा जर्मनी युद्ध पर केंद्रित होने लगा. इसके बाद ये अपील तो बेमानी हो गईं."

Euthanasie in Bayern zur NS-Zeit

बायर्न में जबरन नसबंदी

जब किसी की नसबंदी के बारे में फैसला किया जाता था, तो उसके पास तीन विकल्प होते थे, 1. या तो वह आसानी से इस प्रक्रिया को हो जाने दे, 2. या फिर इसके खिलाफ अदालत में चुनौती दे, या 3. दुनिया से ही गायब होने की कोशिश करे. कानूनी चुनौती का कोई मतलब नहीं था क्योंकि आम तौर पर ऐसी अपीलें गिर जाया करती थीं और भागने वाले को पकड़ लिया जाता था. यानी इससे बचने का कोई रास्ता नहीं था.

जबरन नसबंदी का काम जर्मनी के सभी प्रांतों के अस्पतालों में किया जाता था और यहां तक कि नाबालिग लड़कों को भी इससे अलग नहीं रखा जाता था. कभी कभी तो 14 साल के बच्चों की भी नसबंदी कर दी जाती थी. रिसर्च से पता चलता है कि 1945 तक करीब चार लाख लोगों की नसबंदी की गई. अनुमान है कि इसके बाद बीमार पड़े करीब 6000 लोगों की जान चली गई.

खुद हिटलर ने अपनी डायरी में लिखा, "जिन लोगों का इलाज संभव नहीं है, उन्हें रहम के तौर पर मौत मिल सकती थी." डायरी दूसरे विश्व युद्ध के पहले दिन यानी एक सितंबर, 1939 को लिखी गई. इसके बाद तो नाजियों का बर्बर दौर शुरू हो गया, कम मूल्य वाले जीवन की हत्या. रोथमालर का कहना है, "इस वजह से जिन लोगों को मारा जाता, उन्हें बोझ समझा जाता था. ऐसे लोग, जिनके लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता हो. डॉक्टरों की सोच थी कि हम जिसका इलाज नहीं कर सकते, उसे हटा ही दिया जाए." कई डॉक्टरों और मेडिकल टीम के लोगों को भी इन हत्याओं में दोषी माना गया.

नाजी सत्ता में अगस्त 1941 तक करीब 70,000 लोगों को गैस चैंबरों में बंद करके या फिर जहरीली सुइयों की मदद से मार डाला गया. इसके बाद कैथोलिक चर्च ने इसका विरोध किया, जिसके बाद यह काम खुलेआम बंद कर दिया गया. हालांकि गुप चुप तरीके से नसबंदी का काम जारी रहा.

क्या "आनुवांशिक स्वास्थ्य कानून" बहुत से लोगों की हत्या की वजह बनी? रोथमालर कहती हैं, "कोई नहीं कह सकता है कि यह उसकी वजह से ही किया गया. बल्कि विचार यह था कि किसी तरह से समाज से "बोझ" समझे जाने वालों को हटाया जा सके."

दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ जर्मनी में ही जबरन नसंबदी नहीं होती थी, बल्कि स्वीडन और अमेरिका में भी यह तरीका अपनाया गया. अमेरिका में करीब 60,000 लोगों की जबरन नसबंदी की गई. भारत में इमरजेंसी के दौरान जबरन नसबंदी को भला कौन भूल सकता है.

लेकिन योजना बना कर ऐसे लोगों की हत्या का मामला सिर्फ जर्मनी में ही था. 1945 में दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होने के दशकों बाद तक इस कानून की वजह से प्रभावित हुए लोगों को न्याय नहीं मिल पाया. बहुत बाद में जर्मन सरकार ने इस बात को माना कि उनके साथ नाइंसाफी हुई.

पिछले 50 साल से विकलांग लोगों की मदद कर रही संस्था आक्सिओन मेंश के साशा डेकर का कहना है, "इस बात को याद रखना बहुत जरूरी है कि हमारे इतिहास में इस तरह का अपराध किया गया. और साथ ही हमें यह भी ख्याल रखना चाहिए कि अभी सिर्फ कुछ ही वक्त बीता है."

हालांकि वक्त के इस सफर में डॉक्टरों ने आनुवांशिक बीमारियों के बारे में बहुत कुछ नया जाना है. मेडिकल साइंस अब बहुत से सवालों के जवाब देने में समर्थ है. डेकर का कहना है कि विज्ञान में इतनी तरक्की के बाद भी "कई हिस्सों में हम सिर्फ शुरुआत में ही हैं. हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि सभी लोगों को बराबर समझा जाए."

रिपोर्टः मार्क फॉन लुपके-श्वार्ज/एजेए

संपादनः महेश झा

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