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ब्लॉग

जब जंगलराज ही है तो सरकार की क्या जरूरत

नए साल के शुरू में ही बेंगलुरू ने अपना नया कुत्सित चेहरा दिखाया. सैकड़ों लड़कियों के साथ जो हुआ वह सभ्य समाज का व्यवहार नहीं है. बदमाश उन पर हमला कर रहे थे और सरकार व प्रशासन सो रहे थे. ऐसे में सरकार की क्या जरूरत?

बेंगलुरू भारत के सबसे उदार और सबसे खुले शहरों में से एक है. यही बात आईटी हब और भारत की सिलिकॉन वैली के रूप में उसके विकास का कारण रही है. लेकिन नए साल के मौके पर हुई घटनाओं ने इस उदार अंतरराष्ट्रीय शहर की छवि को नष्ट कर दिया है. अपराध हर शहर में हर जगह होते हैं. नागरिक समाज का काम उन पर अंकुश लगाना है. बेंगलुरू की शर्मनाक बात यह है कि वहां प्रांत के गृह मंत्री घटना को यह कहकर कमतर दिखाते दिखे कि नए साल पर ऐसी चीजें होती हैं. दूसरी ओर पुलिस प्रमुख भी यह कहकर घटनाओं को नजरअंदाज करते नजर आए कि किसी ने शिकायत दर्ज नहीं की है. इसका असर अंतरराष्ट्रीय कारोबारी नगर के रूप में बेंगलुरू के छवि पर भी होगा. लोग असुरक्षित शहरों में जाने से घबराते हैं.

ऐसा नहीं है कि भारत में महिलाओं के साथ यौन दुर्व्यवहार की घटनाएं पहली बार हुई हैं. लेकिन 2012 में दिल्ली के निर्भया कांड के बाद जिस तरह से शहरों में सुरक्षा की गुहार के साथ लोगों का सैलाब सड़कों पर उतरा था उससे उम्मीद जगी थी कि सरकारों का रवैया बदलेगा और समाज अपने एक हिस्से की सुरक्षा के बारे में सोचेगा. लेकिन पिछले सालों में लगातार होती रही इक्का दुक्का घटनाओं और अब बेंगलुरू में बड़े पैमाने पर लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार की घटना दिखाती है कि समाज बिल्कुल संवेदनशील नहीं हो रहा है और सरकार को अपनी जिम्मेदारी की कतई चिंता नहीं है. जो समाज समस्या को स्वीकार ही नहीं करता, वह उसके समाधान में भी दिलचस्पी नहीं लेता.

ऐसा नहीं है कि दूसरी जगहों पर इस तरह की घटनाएं नहीं होती. जर्मनी का कोलोन शहर बड़े पैमाने पर इस तरह के यौन दुर्व्यवहार का एक उदाहरण है. लेकिन पुलिस ने 2015 की घटनाओं से सीख ली और कोलोन के बाद किसी और शहर में उस तरह की घटना नहीं हुई. 2016 में अतिरिक्त कदमों के जरिये लोगों को सुरक्षा का अहसास दिलाया गया और इस बात का भी कि पुलिस लोगों की सुरक्षा के लिए है और वह अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटेगी.

लोगों को आंतरिक और बाहरी खतरों से सुरक्षा देना और सुरक्षित माहौल में जीने और विकास के अवसर देना सरकारों की प्राथमिक जिम्मेदारी है. लोकतंत्र में सरकारें लोगों द्वारा इसीलिए चुनी जाती हैं कि निरंकुश शासक लोगों के एक हिस्से को प्रताड़ित न करे. लेकिन अगर भीड़ प्रताड़ित करने लगे और पुलिस तथा प्रशासन उसमें पीड़ितों की ही गलती देखे कि वह घर से क्यों निकला तो फिर क्या सचमुच सरकार का कोई औचित्य रह जाएगा? भारत सरकार और प्रांतीय सरकारें साल में 20,000 अरब रुपये गैर योजना मदों पर खर्च करती है. यह खर्च नागरिकों की जान माल की रक्षा और बाहरी दुश्मनों से रक्षा के लिए है. आर्थिक और सामाजिक सुविधाओं का खर्च योजना मद से होता है. तो सरकारों और उससे जुड़ी संस्थाओं को पूछने की जरूरत है कि क्या वे लोगों के गाढ़े पसीने की कमाई से मिले 20,000 अरब रुपये के एवज में उचित सेवा दे रही हैं.

लोकतांत्रिक समाजों में सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी है लोगों को सुरक्षा देना. सरकारें चुनी जाती हैं, वह अपना काम करने में कोताही करें तो अगले चुनाव में उन्हें बदला जा सकता है, लेकिन पुलिस की संस्था स्थायी है. पुलिस अधिकारियों को अपनी छवि बनाने और बनाए रखने के लिए खुद काम करना होगा.

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