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ब्लॉग

जन प्रतिनिधियों को कितना अधिकार

लोकतंत्र में जनता की इच्छा सर्वोपरि है और इस इच्छा की एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति चुनाव के माध्यम से होती है, जब जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है और इनमें से ही कुछ मिल कर सरकार बनाते हैं.

ये निर्वाचित लोग अपने आपको को जनता की इच्छा का प्रतिनिधि समझते हैं और यही इनकी लोकतांत्रिक वैधता का आधार भी है. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ये निर्वाचित जन प्रतिनिधि यह दावा करके मनमानी कर सकते हैं कि जनता ने उन्हें चुना है और वे जनता की इच्छा का ही प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. लोकतंत्र में सभी व्यक्ति और संस्थाएं संविधान के दायरे के भीतर ही काम कर सकते हैं. इस दायरे के बाहर जाना सभी के लिए निषिद्ध है.

लेकिन संविधान की व्याख्या को घुमा फिरा कर दायरे से बाहर जाने की कोशिशें होती रहती हैं. जनता के द्वारा चुने जाने का अर्थ अक्सर विधायक या सांसद यह लगाते हैं कि उनके हर काम को जनता की स्वीकृति मिल गई है. अक्सर आपराधिक छवि वाले नेता भी यह कहते पाए जाते हैं कि अंतिम फैसला तो जनता की अदालत ही करेगी. चुनाव में जीत जाने के बाद वे मान लेते हैं कि उनके खिलाफ सभी आरोप जनता की अदालत में खारिज किए जा चुके हैं और कानूनी स्थिति भले ही कुछ हो, उन्हें जनता की ओर से नैतिक मान्यता मिल गई है और वही सर्वाधिक महत्वपूर्ण है.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और निर्वाचन आयोग के बीच हुई भिड़ंत इस प्रवृत्ति की ताजा मिसाल है. चुनाव प्रक्रिया शुरू होते ही आदर्श आचार संहिता लागू हो जाती है और चुनाव के काम में लगे सभी प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में आ जाते है. उन्हें आयोग के निर्देशों का पालन करना होता है और उनकी नियुक्ति और तबादला करने का अधिकार आयोग को मिल जाता है. इसी अधिकार का इस्तेमाल करते हुए आयोग ने आठ अधिकारियों के तबादले कर दिए जिस पर ममता बनर्जी बिफर गईं. उन्होंने एक जनसभा को संबोधित करते हुए घोषणा कर दी कि एक भी अधिकारी का तबादला नहीं किया जाएगा, आयोग मुख्यमंत्री के अधिकार अपने हाथ में नहीं ले सकता और इस मुद्दे पर वह गिरफ्तार होने के लिए भी तैयार हैं.

यही नहीं, उन्होंने आयोग की निष्पक्षता पर भी सवालिया निशान लगा दिया और आरोप लगाया कि वह कांग्रेस, सीपीएम और बीजेपी की साजिश के तहत उनकी सरकार के खिलाफ काम कर रहा है. लेकिन जब आयोग ने स्पष्ट कर दिया कि पूरे पश्चिम बंगाल के चुनाव रद्द किए जा सकते हैं और राज्य के मुख्य सचिव ने भी ममता बनर्जी को लिखकर सलाह दी कि आयोग के निर्देश का पालन करना ही बुद्धिमानी होगी, तब जाकर उन्हें स्थिति की गंभीरता का अहसास हुआ और उन्होंने आयोग की बात मान कर उन अधिकारियों के तबादले कर दिए.

कुछ दिन पहले केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने पार्टी कार्यकर्ताओं की एक सभा में कहा कि वे एक जगह वोट डालने के बाद अंगुली पर लगी स्याही को पोंछ कर पार्टी के पक्ष में दूसरी जगह वोट डालें और हर कार्यकर्ता को कम से कम दो बार वोट डालना चाहिए. मतदान में बेईमानी के लिए किए गए इस खुल्लमखुल्ला आह्वान से सभी सकते में रह गए. लेकिन जब निर्वाचन आयोग ने उनसे जवाब तलब किया तो उन्होंने कहा कि वह तो मजाक कर रहे थे. बीजेपी के नेता अमित शाह ने मुजफ्फरनगर और बिजनौर में हिन्दुओं से कहा कि इस चुनाव में वे अपने अपमान का बदला लें. समाजवादी पार्टी के महासचिव आजम खां ने बयान दिया कि कारगिल युद्ध में सिर्फ मुसलमानों ने हिस्सा लिया और देश के लिए जान कुर्बान की. निर्वाचन आयोग ने इन सभी से जवाब मांगा है.

सौभाग्य से टीएन शेषन के कार्यकाल में निर्वाचन आयोग ने अपने संवैधानिक अधिकारों का पूरा पूरा इस्तेमाल करने का जो आत्मविश्वास अर्जित किया था, उसमें अभी भी कोई कमी नहीं आई है. पूरे विश्व में माना जाता है कि भारत में निर्वाचन आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से चुनाव कराता है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और इतने विराट पैमाने पर कहीं और चुनाव नहीं होते. लेकिन उसकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर अंगुली उठाने वाली ममता बनर्जी अकेली नहीं हैं.

अधिकांश राजनीतिक दल किसी न किसी समय पर इस तरह के आरोप लगाते रहे हैं. चुनाव में धांधली को रोकने के आयोग के प्रयासों का बहुत सकारात्मक नतीजा निकला है और सभी इस हकीकत को स्वीकार करते हैं कि अब भारत में चुनाव पहले की अपेक्षा अधिक बेहतर ढंग से हो रहे हैं.

लेकिन जब तक निर्वाचन आयोग के पास कानून का उल्लंघन करने वाले नेताओं और राजनीतिक दलों के खिलाफ कठोर कार्रवाई का अधिकार नहीं होगा, और वह इस अधिकार का निस्संकोच इस्तेमाल नहीं करेगा, तब तक संवैधानिक सीमा के अतिक्रमण की प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लग पाएगा. लोकतंत्र में सभी संवैधानिक संस्थाओं को भी अपने लिए निर्धारित सीमा के भीतर रह कर ही काम करना होता है.

लेकिन कई बार राजनीतिक वर्ग की अक्षमता या अदूरदर्शिता के कारण भी उन्हें अपने दायरे को बढ़ाना पड़ता है. वरना कोई कारण नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय को 2002 में हुए गुजरात दंगों की जांच में या उनसे संबंधित अदालती मामलों में हस्तक्षेप करना पड़ता या कोयला खानों के आवंटन में हुए कथित घोटालों की सीबीआई से अपनी देख रेख में जांच करानी पड़ती.

ब्लॉगः कुलदीप कुमार

संपादनः ए जमाल

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