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ब्लॉग

जजों के चुनाव की प्रक्रिया पर विवाद

जस्टिस मार्कंडेय काटजू के एक खुलासे ने जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव की जबरदस्त भूमिका लिख दी है. साथ ही यह भी साबित कर दिया कि भारत में हर काम के पीछे प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर राजनीति जरुर छुपी होती है.

जस्टिस काटजू ने भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे मद्रास हाईकोर्ट के एक तदर्थ जज का कार्यकाल बढ़ाने में राजनीतिक दबाव का खुलासा कर जजों की नियुक्ति संबंधी दो दशक पुरानी कॉलेजियम प्रणाली को खत्म करने की पहल में निर्णायक मदद की. इस खुलासे के समय पर उठे सवाल भी नई प्रणाली के आगाज की बहस में दब कर रह गए. आज बहस के केन्द्र में सिर्फ न्यायिक नियुक्ति आयोग की रुपरेखा ही तैर रही है. नतीजतन जो काम पूर्ववर्ती यूपीए सरकार दस सालों में नहीं कर पाई उसे मोदी सरकार संसद के चालू सत्र में ही करने की दिशा में तेजी से बढ़ चली है.
मजबूत भूमिका
जस्टिस काटजू ने जिस अप्रत्याशित अंदाज में इस मामले का खुलासा किया उससे एक बात तो साफ हो गई कि यह सब पूर्व नियोजित कार्यक्रम का हिस्सा था. घटनाक्रम बताता है कि 21 जुलाई को जस्टिस काटजू का लेख प्रकाशित होते ही मामला संसद में गूंजा और इसके तुरंत बाद मानो मौके की तलाश में बैठे कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी कॉलेजियम सिस्टम को खत्म कर न्यायिक नियुक्ति आयोग गठित करने का एलान कर दिया.
इसके बाद रेंगते हुए चलने वाले सरकारी कामकाज के अंदाज से उलट बीते एक सप्ताह में सरकार ने इस हेतु न सिर्फ संविधान संशोधन करने की पूरी तैयारी कर ली बल्कि इससे पहले न्यायविदों से सलाह मशविरा भी कर लिया. इतना ही नहीं अब सर्वदलीय बैठक बुला कर इस कवायद पर संसद से बाहर सियासी दलों के साथ सहमति कायम करने जा रही है.
मौजूदा प्रणाली
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए मौजूदा कॉलेजियम प्रणाली 1993 में लागू की गई थी. न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता बरकरार रखने के लिए इस व्यवस्था के तहत उच्च अदालतों के जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका और विधायिका का हस्तक्षेप खत्म कर दिया गया और जजों की नियुक्ति की जिम्मेदारी न्यायपालिका को सौंप दी गई.
संविधान के अनुच्छेद 124 में वर्णित प्रक्रिया के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में पांच वरिष्ठतम जजों की सदस्यता वाला कॉलेजियम हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति की अनुशंसा केन्द्र सरकार को करता है. इस पर केन्द्र सरकार के पास परामर्शी अधिकार के साथ सिर्फ सहमति देने का विकल्प है. केन्द्र सरकार की सहमति से राष्ट्रपति जजों की नियुक्ति करते हैं. इसमें सरकार या संसद के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं होती है.
कॉलेजियम का अनुभव
इस प्रणाली की कुशलता पर कई बार सवाल उठ चुके हैं. ताजा मामला हाल ही में कॉलेजियम द्वारा सुप्रीम कोर्ट के जज बनाए जाने हेतु तैयार की गई सूची में वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम का नाम शामिल करने का है. इसमें सुब्रमण्यम के नाम पर मोदी सरकार की आपत्ति के बाद न सिर्फ कॉलेजियम के भविष्य पर बल्कि सरकार के इस हस्तक्षेप पर भी सवाल खड़े हुए थे. मोदी सरकार ने हालात की गंभीरता को तत्काल भांपते हुए इस व्यवस्था को ही खत्म कर न्यायिक आयोग के गठन की भूमिका तैयार कर ली थी.
सरकार को सिर्फ माकूल वक्त का इंतजार था जो जस्टिस काटजू ने उसे मुहैया करा दिया. हालांकि इससे सरकार ने एक तीर से दो निशाने साध लिए. एक तो खुलासे के बाद कॉलेजियम सिस्टम के पैरोकार न्यायपालिका में हस्तक्षेप की दुहाई देकर इसका विरोध नहीं कर पा रहे हैं और गोपाल सुब्रमण्यम के कटु अनुभव से आहत वकीलों की जमात भी फिलहाल बदलाव होते देखना चाहती है इसलिए चुप है.
नयी व्यवस्था
जजों की नियुक्ति की नई व्यवस्था ने इसमें विधायिका और कार्यपालिका के दखल का मार्ग प्रशस्त कर दिया है. प्रस्तावित आयोग में छह सदस्यों को रखने की बात कही जा रही है. इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठतम जजों के अलावा केन्द्रीय कानून मंत्री और दो प्रतिष्ठित कानूनविद होंगे जिनका चयन प्रधानमंत्री लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के परामर्श से करेंगे. जबकि केन्द्रीय विधि सचिव को आयोग का संयोजक बनाने का प्रस्ताव है.
पिछली सरकार सामान्य विधेयक के जरिए आयोग का गठन करना चाहती थी तो मौजूदा सरकार ने इसके लिए संविधान में संशोधन करने का फैसला किया है. अनुच्छेद 124 में संशोधन के जरिए आयोग को संवैधानिक दर्जा मिलेगा और इसके गठन को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी. नई व्यवस्था मौजूदा प्रणाली की कमियों को दूर कर पाएगी या नहीं यह तो समय ही बताएगा लेकिन विधायिका और न्यायपालिका में बीते पांच दशक से चल रहे अहम के टकराव में सियासी जमात को फौरी तौर पर निर्णायक बढ़त जरुर मिल गई है.
ब्लॉग: निर्मल यादव
संपादन: महेश झा

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