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दुनिया

जंगल की गोद में जीवन

दक्षिण भारत के एक आदिवासी इलाके में महिलाओं ने जंगल को अपने व्यापार का केंद्र और प्राकृतिक उत्पादों को कमाई का प्रमुख जरिया बना लिया है. सौर तकनीक उनके व्यापार में बड़ी मजबूती से हाथ बंटा रही है.

34 साल की चिंतपक्का जंबूलम्मा बड़ी प्रशंसा के भाव से अपने सोलर ड्रायर को देखती हैं. अद्वितल्ली ट्राइबल वीमेन कोओपरेटिव सोसाइटी नामके उनके महिला उद्यमियों के संगठन की यह सबसे पसंदीदा चीज है. वह ड्रायर के एक खाने को खोल कर दवा के रूप में इस्तेमाल होने वाले एक पौधे कालमेघ को दिखाते हुए कहती हैं, "देखो, यह कितनी तेजी से सूख रहा है."

उनके संगठन की महिलाएं दक्षिण भारत के पूर्वी घाट के कोया और कोंड समुदाय से हैं. वे हमेशा से जंगल में रहती आई हैं और यही उनके जीवन यापन का सहारा भी रहा है. अब वो इक्रो फ्रेंडली आधुनिक तकनीक का भी सहारा ले रही हैं. इनके सोलर ड्रायर से चार पैनल जुड़े हैं. इसे दो साल पहले कोवेल फाउंडेशन नामके एक गैरसरकारी संगठन ने लगाया था जिसकी मदद से इन महिलाओं को अपना जीवन स्तर सुधारने में काफी मदद मिली है.

ड्रायर की कीमत है करीब 17,000 डॉलर या 10 लाख रुपये. कोवेल फाउंडेशन के निदेशक कृष्णा राव बताते हैं, "इस सहकारी संगठन में 20 गांवों की करीब ढाई हजार महिलाएं हैं. इनमें से किसी ने भी जूनियर स्कूल से आगे की पढ़ाई नहीं की है. लेकिन व्यापार चलाना वे अच्छी तरह जानती हैं." राव को लगता है कि ड्रायर की लागत का सही इस्तेमाल हो रहा है, "वे सीख रही हैं कि पौधे को नुकसान पहुंचाए बगैर पत्तियां और फल कैसे चुने जाएं, जिससे उनका लंबे समय तक इस्तेमाल हो सके."

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जंगल से मिलती कई जरूरी चीजें

इस इलाके के जंगलों से 700 से भी ज्यादा तरह के ऐसे उत्पाद मिलते हैं जिनका इस्तेमाल लकड़ी के लिए नहीं किया जाता. पत्तिया, जड़ी बूटियां, शैवाल, बीज, जड़ें और भी बहुत कुछ. शहद, गोंद, आंवला, तेंदु के पत्ते और महुआ के फूल यहां से मिलने वाली कुछ सबसे लोकप्रिय चीजें हैं. कोया और कोंड समुदाय के लोगों ने सदियों से इन चीजों से ही जीविका कमाई है.

इन जंगलों से इकट्ठा की गई ज्यादातर चीजें जंगल विभाग खरीद लेता है. जंगल से मिलनेवाली करीब 25 चीजें तो ऐसी हैं जिन्हें और किसी को बेचने की अनुमति ही नहीं है. लेकिन कई आदिवासी लोगों को लगता है कि जंगल विभाग के सामान बेचने की प्रक्रिया काफी धीमी है और उन्हें चीजों के सही दाम भी नहीं मिलते. जैसे कि करौंदे के लिए विभाग 45 रुपये प्रति किलो का भाव देता है जबकि बाजार में इसकी कीमत करीब 60 रुपये है.

सरकारी विभागों को सस्ते दामों में बेचने की मजबूरी से तंग आकर ही यहां की महिलाओं ने अपना एक सहकारी संगठन बनाने के लिए प्रेरित किया. दो साल के भीतर ही उन्होंने करीब दो लाख रुपये कमा कर दिखा दिये.

कोवेल फाउंडेशन ने इन्हें ट्रेंनिंग भी दी जिससे वे अपनी चीजों को बेचने के लिए खरीदारों के साथ समझदारी से मोलभाव कर पाएं. ईश्वरम्मा कहती हैं, "हम कड़ी मेहनत करते हैं, अच्छी किस्म की बूटियां और बीज जमा करते हैं, तो हम कम दाम क्यों लें. आखिर इन पैसों पर हमारा जीवन निर्भर करता है."

लेकिन इकट्ठा की गई चीजों को जल्दी से सुखाना और उसे ठीक तरीके से सुरक्षित रखने की मुश्किल हमेशा इन महिलाओं के रास्ते में आती रही. कभी तूफान तो कभी मौसम की किसी और तरह की मार से मुनाफा घटता रहा. ऐसे में सोलर ड्रायर के इस्तेमाल से वे अपना नुकसान कम कर सकी हैं. सिर्फ पिछले एक साल में ही इनके जंगल को पांच बड़े तूफान झेलने पड़े थे. लेकिन वे संगठन की महिलाओं के उत्पादों को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा पाए. अब सुखाने और पैकिंग की अच्छी सुविधा मिलने से महिलाएं आगे के बारे में सोच रही हैं. वे अब इन उत्पादों के नियमित खरीदारों का एक नेटवर्क बनाना चाहती हैं.

आरआर/ओएसजे (आइपीएस)