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ब्लॉग

जंगल उनका घर है

केसरीपाड़ी, सेरकापाड़ी, ताडीझोला, कुनाकेड, पालबाड़ी, बातुडी, फुलदुमेर, इजुरूपा, लांबा. ये नाम जंगल की सबसे पेचीदा लड़ाई के प्रतीक हैं. उड़ीसा के ये वे गांव हैं जिन्होंने बहुराष्ट्रीय कंपनी वेदांता के खनन को ना कहा है.

उड़ीसा सरकार से 2004 के समझौते के तहत वेदांता ने कालाहांडी जिले के पास लांजीगढ़ में एलुमिना रिफाइनरी लगाई है. उसे चलाने के लिए बॉक्साइट चाहिए. उड़ीसा खनिज निगम को सात करोड़ टन बॉक्साइट मुहैया कराना है. नियमागिरी नाम के पहाड़ के अंदर वो अपार मात्रा में जमा है. सो पहाड़ खोदना होगा. राज्य सरकार तो सदैव हां की मुद्रा में थी ही, वेदांता के कारिंदे इंजीनियर भी मशीनों के साथ तैयार बैठे थे लेकिन नियमागिरी को अपने भगवान का वास मानने वाले डोंगरिया कोंध आदिवासियों ने ऐसा नहीं होने दिया. उनका मासूम सा सवाल यही था और यही है कि भला अपने इष्ट देव को भी कोई उखाड़ता है.

कुदरत से ऐसा तादात्म्य अद्भुत है. आदिवासी उसे ऐसे पुकारते हैं जैसे बस वो सहसा बच्चे की तरह हड़बड़ाकर उठेगा और सीधे उनके बीच चला आएगा. इन आदिवासियों को निवेश नहीं पता, डॉलर नहीं पता, घोड़ा गाड़ी बंगला साज सामान नहीं पता. उन्हें तो बस यही पता है कि नियमागिरी उनके देवता का घर है, पहाड़ी की नोक पर वो रहता है और वे उसके जन हैं. उसे कुपित नहीं करना है. इसे आप यूं पिछड़ापन कहकर खारिज कर सकते हैं लेकिन गौर से देखें तो ये असल में जल जंगल जमीन के संरक्षण की पारंपरिक और पीढ़ियों की वचनबद्धता की मिसाल है. क्योंकि ये पहाड़ उन आदिवासियों की जीवनरेखा है.

इसी साल 18 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक आदेश दिया कि अगर नियमागिरी वहां के लोगों के लिए देवता है और वहां की परंपरा और संस्कृति में उसकी ऐसी अतुलनीय भूमिका है तो वहीं के लोग तय करें कि नियमागिरी में खनन होगा या नहीं. कोर्ट ने कहा था कि इस इलाके में पड़ने वाली 112 ग्राम सभाओं से पूछिए. लेकिन उड़ीसा सरकार निवेश की बेसुधी में कोर्ट के आदेश पर कानूनी दलील ले आई. कालाहांडी और रायगढ़ जिलों की 12 ग्राम सभाओं की रायशुमारी से ही काम चलाया जा रहा है. पांच कालाहांडी की और सात रायगढ़ की. 

इन ग्राम सभाओं का गठन जिस तरह किया गया वो भी विवादों में रहा. कुछ गांवों में लोगों की संख्या ही बहुत कम थी. एक विवाद ये भी उठा कि केंद्र की यूपीए सरकार यूं तो निवेश के लिए बड़ी आतुरता दिखाती है फिर वेदांता से ये बेरुखी क्यों. कहा जाता है कि नियमागिरी को लेकर आदिवासी भावना से कांग्रेस नेता राहुल गांधी “अभिभूत” थे, कहकर गए कि मैं आपका दिल्ली में सिपाही हूं. काश ये भावना जल जंगल जमीन पर कब्जे के खिलाफ देश भर के अन्य आंदोलनों के प्रति भी रहती.

राहुल या किसी और दबाव में नियमागिरी में वेदांता की हार हो रही है, ये कहना जल्दबाजी है जैसा कि ये मान लेना भी जल्दबाजी है कि आदिवासियों का हक आखिरकार बना ही रहेगा. उनकी लड़ाई का ये पहला पड़ाव है. इसके बाद कोर्ट कचहरी विधानसभा संसद सब होगा. क्या वेदांता लौटेगा. क्योंकि उसने अपनी रिफाइनरी भी बना डाली है. अव्वल तो सवाल यही है कि बॉक्साइट की आमद से पहले ही रिफाइनरी कैसे खड़ी कर दी गई, क्या इतना पक्का यकीन था. क्या अब वो उसे उखाड़ कर घर ले जाएगा. या वो इंतजार करेगा. कुछ ऐतिहासिक तकलीफें हमें बताती हैं कि इंतजार वे ताकतें भी करती हैं जो आज न सही तो कल के भाव से हड़प का एक दूरगामी मॉडल लेकर फंक्शन करती हैं.

लेकिन कुछ ऐतिहासिक जीतें भी हमें कुछ बताती हैं कि संघर्ष की रेखा धुंधली नहीं पड़ती है. और वो चक्कर काटती हुई एक निर्णायक घेरा प्रतिरोध का खींच देती है.

12 ग्राम सभाओं में से नौ का फैसला आ चुका है. बारी बारी से सबने वेदांता के प्रोजेक्ट को नकार दिया है और राज्य सरकार हैरान परेशान है कि हो क्या रहा है. “कैम्पेन फॉर सरवाइवल एंड डिगनिटी” नाम की संस्था का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दूरगामी असर होगा. ग्राम सभाओं की शक्ति फिर से स्थापित हो पाएगी कि वे बस ठप्पाकारी संस्था न रह जाएं. कोर्ट के इस फैसले की जमीन, संघर्ष और इंकार की उस ठोस मिट्टी से भी बनी होगी जिससे नियमागिरी के जल जंगल का और उसके लोगों की स्मृति, आकांक्षा और जीवन का सृजन हुआ है. ‘और ये गहरा अरण्य उसका अध्यात्म नहीं उसका घर है‘ जैसा कि हिंदी कवि मंगलेश डबराल की कविता “आदिवासी” में है. करीब दस हजार की संख्या में रह गए डोंगरिया कोंध जब कहते हैं कि नियमागिरी के ऊपर उनका भगवान नियमराजा विद्यमान है तो वे किसी अध्यात्म के हवाले से ऐसा नहीं कहते, वे अपने पुरखों के श्रम को इंगित करते हुए कहते हैं.

नियमागिरी की लड़ाई क्या मोड़ लेती है, इससे देश के दूसरे हिस्सों में अधिग्रहण और विस्थापन से जुड़े आंदोलनों को भी गति मिल सकती है. उड़ीसा में ही देश का सबसे बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश किया है दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी दक्षिण कोरियाई स्टील कंपनी पोस्को ने. निवेश और मुनाफे का ये स्टील, इस्पाती इरादों पर भारी न पड़ जाए, ये दुश्चिंता भी बनी हुई है.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी, देहरादून

संपादनः एन रंजन

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