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दुनिया

छोड़ो राजनीति बेचो सामान

हैम्बर्ग में चार आरोपियों पर मुकदमा चल रहा है. इन्होंने ईरान पर व्यापार प्रतिबंध का उल्लंघन किया है. यह परेशानी केवल यहीं तक सीमित रहेगी या आने वाले दिनों में खतरा बन जाएगी?

दुनिया के ज्यादातर देशों को पुर्जे निर्यात करना कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन ईरान को सामान बेचना अलग बात है. यूरोपीय संघ में यह प्रतिबंधित है और कियानजाद, गुलाम अली, हामिद और रूडॉल्फ नाम के चार व्यक्तियों ने इस कानून को तोड़ा है. अब हैम्बर्ग की एक अदालत के सामने उन्हें पेश होना है.

चार आरोपियों के बारे में कहा जा रहा है कि उन्होंने जर्मनी से ईरान कुछ पुर्जे बेचे और भारत से भी ईरान निर्यात कराने की योजना बनाई. यह खास पुर्जे एक ऐसी ईरानी कंपनी को बेचे गए जो अरक शहर में हेवी वॉटर रिएक्टर बनवा रही है. हेवी वॉटर में हाइड्रोजन की जगह ड्यूटीरियम का इस्तेमाल होता है जो परमाणु हथियार बनाने के लिए अहम है.

ईरान पर प्रतिबंध

ईरान के साथ व्यापार पर शायद दुनिया में सबसे ज्यादा रोक लगाए गए होंगे. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को लगता है कि वैसे तो परमाणु अप्रसार संधि पर ईरान ने दस्तखत किए हैं लेकिन शायद वह परमाणु बम बनाने की कोशिश कर रहा है.

हाल ही में अमेरिका और ईयू ने ईरानी बैंकों और ऊर्जा सेक्टर पर प्रतिबंध लगाए. 2012 से ईरान से तेल खरीदने पर प्रतिबंध है और वहां से गैस भी नहीं खरीदा जा सकता. यूरोपीय और ईरानी बैंकों के बीच पैसों के लेनदेन को भी रोक दिया गया. तकनीक, सेवाएं और व्यापार, परमाणु कार्यक्रम को फायदा पहुंचाने वाली हर चीज पर रोक लगाई गई है. इन प्रतिबंधों के बावजूद चीन को छोड़ दें तो जर्मनी ईरान का पश्चिमी देशों में सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है. इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात, भारत और दक्षिण कोरिया ईरान के साथ व्यापारिक संबंध रखते हैं. 2012 में जर्मन कंपनियों ने ढाई अरब यूरो का सामान ईरान को बेचा.

सरकार को अब चिंता है कि कंपनियां अपना सामान बेचने के लिए कुछ भी करेंगी. राजनीति अपनी जगह, व्यापार अपनी जगह होता है. लेकिन सरकार को भी पता नहीं कि वह कहां कहां सीमाएं तय करे. ऐसी कई तकनीकें हैं जिनका इस्तेमाल अलग अलग कामों में होता है. हाल ही में रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में कहा गया कि ईरान कई देशों से कच्चा अल्युमिनियम आयात कर रहा है. इससे मिसाइल के कवच बनाए जाते हैं. जनवरी 2012 और मार्च 2013 तक पता चला है कि जर्मनी और फ्रांस सहित स्लोवेनिया, इटली, हंगरी और बेल्जियम की कंपनियों से 4000 मेट्रिक टन अल्युमिनिया यानी कच्चा अल्युमिनियम खनिज भेजा गया. विशेषज्ञों का मानना है कि इस खनिज के एक टन के लिए 700 से लेकर 1000 यूरो खर्च किए गए जिसका मतलब है कि यह खनिज ऊंची श्रेणी का था और इसका इस्तेमाल हथियारों के लिए किया जा सकता था.

क्या काफी है नियंत्रण?

ईरान को क्या बेचना है और क्या नहीं, यह फैसला मुश्किल हो सकता है. कुछ चीजें सैन्य और असैन्य कामों के लिए इस्तेमाल की जा सकती हैं. जर्मन-ईरानी चेंबर ऑफ कॉमर्स के मिषाएल टोकुस कहते हैं, "दांत की फिलिंग में इस्तेमाल किए जाने वाले रसायन को ईरान भेजा जा सकता है." ईरान भेजी जाने वाली हर चीज को कस्टम विभाग में दर्ज कराया जाता है. ईरान के साथ परेशानी कम करने के लिए कई जर्मन कंपनियां अपने सामान को खास तौर पर दर्ज कराती हैं. हालांकि ईयू की कंपनियां ईरान के रेवॉल्यूशनरी गार्ड और कुछ खास कंपनियों के साथ व्यापार नहीं कर सकती हैं. वह केवल ईयू में दर्ज कंपनियों के साथ ही काम कर सकती हैं.

नियंत्रण तोड़ना ज्यादा मुश्किल नहीं. स्टॉप द बॉम्बे नाम की संस्था के माइकल स्पेनी कहते हैं कि ईरान के साथ गैर कानूनी व्यापार करना मुश्किल नहीं. जर्मन पासपोर्ट के साथ दलाल जर्मनी में कंपनियां खोलते हैं जिनपर कम चेक होती हैं. फिर आप कहते हैं कि आप सामान तुर्की ले जा रहे हैं, लेकिन सामान असल में ईरान जाता है.

रिपोर्टः स्वेन पोल/बेन नाइट, एमजी

संपादनः एन रंजन

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