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दुनिया

छोटे उद्योग धंधों पर नोटबंदी की बड़ी मार

महाराष्ट्र में भिवंडी के पावरलूम कारखानों की रौनक खोने लगी है. नोटबंदी के बाद हजारों पावरलूमों में शोर थम गया है. यहां काम करने वाले मजदूरों का पलायन भी शुरू हो गया है.

देश भर में विख्यात भिवंडी का पावरलूम सेक्टर इन दिनों संकट के दौर से गुजर रहा है. आर्थिक मंदी के कारण पहले से ही मुसीबत का सामना कर रहे पावरलूम करखानों में नोटबंदी का बहुत बुरा असर पड़ा है. शहर की हजारों पावरलूम ईकाइयां बन्द होने की कगार पर आ गई हैं.

मुंबई से सटे भिवंडी शहर की पहचान टेक्सटाइल उद्योग की वजह से है. यहां तकरीबन 8 लाख पावरलूम कारखाने हैं. यहां की लगभग 90 फीसदी आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लूम कारोबार से जुड़ी है, जिसके चलते इसे कभी एशिया का मैनचेस्टर तो कभी महाराष्ट्र का मैनचेस्टर जैसे विशेषण दिए जाते हैं. सरकार के पांच सौ और एक हजार के पुराने नोट बंद किए जाने के बाद उपजी नगदी की समस्या से लूम कारोबारी परेशान हैं.

मजदूरों का पलायन

पावरलूम में काम करने वाले अधिकतर मजदूर उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के रहने वाले हैं. नोटबंदी की सबसे ज्यादा मार इन्हीं मजदूरों पर पड़ी है. कारोबारियों के पास मजदूरी देने के लिए नगदी नहीं है इसलिए यहाँ कार्यरत मजदूरों को रहने, खाने की दिक्कतें आने लगी हैं. कारोबारी चाह कर भी इन मजदूरों की मदद नहीं कर पा रहे हैं. जैसे जैसे दिन बीतता जा रहा है, मजदूर निराश होकर अपने गांवों को लौटने लगे हैं. कारोबारियों को आशंका है कि मजदूरों का पलायन अगर जल्द ना रोका गया, तो भिवंडी का पूरा कपड़ा उद्योग ही बर्बाद हो जाएगा. पावरलूम एवं सायजिंग उद्योग से जुड़े पूर्व विधायक अब्दुल रशीद ताहिर मोमिन का कहना है कि एक बार अगर मजदूर अपने घरों को लौट जाते हैं तो 3-4 महीने से पहले लौट के नहीं आते. यानी अगले चार महीने के लिए कारोबार पूरी तरह ठप्प हो जायेगा.

मुश्किल होंगे हालात

रशीद ताहिर मोमिन का आंकलन है कि नोटबंदी के चलते 50 से 70 फीसदी कारखानों के कार्य प्रभावित हुए हैं. उनका दावा है कि आधे से ज्यादा कारखाने बंद ही हो चुके हैं और जो चल रहे हैं उनका उत्पादन आधे से भी कम रह गया है. वहां कुछ घंटे का ही काम हो पा रहा है. भुगतान के संकट के चलते ग्रे कपड़ा व्यापारी से मांग में गिरावट आयी है. यार्न मार्केट में कोई भी व्यापारी पुराने नोट नहीं ले रहा और नए नोट अभी उपलब्ध ही नहीं हैं. लूम मालिकों के पास न तो माल खरीदने के लिए धन बचा है और ना ही मजदूरों को रोके रखने के लिए.

भिवंडी में पावरलूम के अलावा उससे जुड़े वारपिन, ट्विस्टिंग, सायजिंग,  डाइंग एवं प्रोसेसिंग इकाइयां और सैकड़ों की संख्या में मोती कारखाने हैं. बंद होते लूम का असर इन लघु उद्योगों पर भी पड़ रहा है. डाइंग एवं प्रोसेस इकाइयां भी बंद होने लगी हैं. इसमें काम करने वाले हजारों मजदूरों को रोजगार की चिंता सताने लगी है.

कैशलेस व्यवस्था से जुड़ेंगे मजदूर 

केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति इरानी ने पावरलूम मजदूरों के पलायन को रोकने और नोटबंदी से मजदूरों को हो रही परेशानियों से निजात दिलाने के लिए मजदूरों को बैंक से जोड़ने की सलाह दी है. पावरलूम मजदूरों का बैंक अकाउंट पावरलूम मालिकों एवं मजदूरों की समस्याओं को समझने भिवंडी आईं स्मृति ईरानी ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि सरकारी शिविर लगाकर मजदूरों के बैंक अकाउंट खोले जायें, ताकि एक भी मजदूर बैंक अकाउंट से वंचित न रहे. मंत्री ईरानी ने कहा कि मजदूरों का आधार कार्ड बनवाने और अकाउंट खोलने के अलावा उन्हें मोबाइल बैंकिंग और कैशलेस व्यवस्था से जोड़ने के लिए प्रशिक्षण शिविर लगाया जायेगा.

कालेधन के खिलाफ सरकार के इस कदम की सराहना करने वाले कारोबारियों और मजदूरों की कमी नहीं है लेकिन वह बस इतना चाहते हैं कि नोटबंदी से हो रही परेशानियों को दूर करने के लिए सरकार जल्दी कदम उठाये. वैसे भी पूरी तरह कैशलेस हो चुका ठाणे का धसई गांव, भिवंडी से ज्यादा दूर नहीं है. नादिर भाई कहते हैं कि मजदूरों और लूम मालिकों को भी कैश की जगह कैशलेस ट्रांजेक्शन से कोई गुरेज नहीं है, पर इसमें समय लगेगा. लूम मालिक, सीखने और सिखाने की इस प्रक्रिया के दौरान, कारोबार में ठहराव की आशंका से चिंतित हैं.

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