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विज्ञान

छात्रों ने बनाई जादुई कार

पेट्रोल-डीजल के लगातार बढ़ते दामों से परेशान कार के शौकीनों के लिए अच्छी खबर है. मुंबई के कुछ छात्रों ने एक ऐसी कार का प्रोटोटाइप तैयार किया है जो एक लीटर ईंधन में 300 किलोमीटर की दूरी तय कर सकता है.

"जुगाड़" नाम की इस कांसेप्ट कार को मुंबई के केजे. सौमेया इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों ने बनाया है. इसे बनाने में कॉलेज के 40 छात्रों की एक टीम ने महीनों पसीना बहाया है. इस कार को मलेशिया में होने वाले "शेल इको मैराथन" के लिए चुना गया है. लगभग 60 किलो वजन की इस कार को 40 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ाया जा सकता है.

जुगाड़ के सह निर्माता कुणाल जैन ने डीडब्ल्यू से बात करते हुए कहा कि इस कार को बनाते समय इसके एयरोडायनमिक्स पर ज्यादा ध्यान दिया गया है. इसके कारण हवा अवरोधक की बजाय सहयोगी बन जाती है. ईंधन क्षमता बढ़ाने के लिए इसके वजन को 60 किलो से कम रखा गया. वजन कम रखने के लिए फाईबर और एल्यूमिनियम का इस्तेमाल किया गया है. कम ईंधन खपत हो इसलिए इसमें मात्र 35 cc का इंजन लगाया गया है.

जुगाड़ टीम के सदस्य टोनी थॉमस ने बताया कि इसमें और काम किया जाना बाकी है. उनका कहना है कि इसमें लीवर और सुरक्षा के उपकरण लगाने की भी जरूरत है. थॉमस कहते हैं कि यह एक कांसेप्ट कार है जिसे प्रतियोगिता को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है.

इंजन रिसर्च लैब से जुड़े शोधकर्ता चेतन पटेल कहते हैं कि एयरोडायनमिक्स पर काम करके निश्चित तौर पर इंधन की क्षमता बढ़ाई जा सकती है. वे कहते हैं कि छात्रों ने कार की डिजाईन ऐसी है बनाई है जो एयरोडायनमिक्स के सिद्धांत के तहत ईंधन की खपत में कमी लाई सकती है. इसके अलावा 35cc के इंजन को देखते हुए 300 किलोमीटर का माइलेज हासिल किया जा सकता है. वैसे इस कार की क्षमता और जुगाड़ टीम के दावों की असली परीक्षा सेपांग इंटरनेशनल फार्मूला 1 सर्किट पर ही होगी.

जुगाड़ से हुआ जुगाड़ का जन्म
छात्रों द्वारा निर्मित यह जुगाड़ कार अपने नाम को पूरी तरह सार्थक सिद्ध करती है. 'जुगाड़' का इंजन घास काटने वाली मशीन से लिया गया है, जबकि उस पर फाइबर ग्लास की बॉडी तिपहिया साइकिल के पहिये जोड़कर बनाई गई है. 'जुगाड़' को किसी रेसिंग कार की तरह पैर पसारकर चलाना पड़ता है.
कुणाल जैन के अनुसार कॉलेज की लाइब्रेरी में 'जुगाड़ इनोवेशन' शीर्षक वाली एक किताब से इस कार को बनाने की प्रेरणा मिली, इसलिए इस कार का नाम 'जुगाड़' रखा गया.

कुणाल के मुताबिक, "हमने इस कार को बनाने में रोजाना कॉलेज के बाद आठ-नौ घंटे की मेहनत की. जुगाड़ को बनाने के लिए कभी-कभी क्लास भी बंक करना पड़ा. इसके अलावा कार बनाने के बारे में बेसिक आइडिया हासिल करने के लिए हमने कार मैन्यूफैक्चरिंग प्लांट का दौरा भी किया."
मिलेगी अंतराष्ट्रीय पहचान
जुगाड़ का प्रोटोटाईप मलेशिया के लिए रवाना हो गया है, जहां इसे अगले महीने होने वाली 'शेल ईको-मैराथन' में शामिल किया जाएगा. यह रेस सेपांग इंटरनेशनल फॉर्मूला 1 सर्किट पर होनी है. प्रतियोगिता में जुगाड़ का मुकाबला 18 अलग-अलग देशों के इस तरह के 150 अन्य मॉडलों से होगा. इस प्रतियोगिता में गाड़ियों को उनकी माइलेज से ही आंका जाता है. रेस के नियमों के मुताबिक हर कार को 250 मिलीलीटर पेट्रोल दिया जाएगा और 11.2 किलोमीटर ट्रैक पर दौड़ने के लिए कहा जाएगा. जो प्रोटोटाईप सबसे ज्यादा दूरी तय करेगा, वही विजेता होगा. जुगाड़ निर्माताओं को जीत का पूरा भरोसा है. प्रतियोगिता को ध्यान में रखते हुए जुगाड़ टीम ने माइलेज की परख के लिए 20 दिन तक 250 मिलीलीटर पेट्रोल के साथ हर रोज 10 किलोमीटर की टेस्ट ड्राइव की.
कार निर्माताओं ने 'जुगाड़' को बनाने में बहुत जुगाड़ लगाये फिर भी लगभग चार लाख रुपये खर्च हो ही गए.कॉरपोरेट फंडिंग के जरिए छात्रों को उनके पैसे वापिस मिल गए हैं.

देश के विकास में हो सकता है उपयोगी

तेल आयात पर होने वाला खर्च भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा बोझ है. देश में पेट्रोलियम उत्पाद की कुल जरूरत के 80 फीसदी का आयात किया जाता है. परिवहन क्षेत्र की तेल पर निर्भरता कम करने के लिए भारत सरकार बिजली से चलने वाले या हाइब्रिड वाहनों के विकास की जरूरत पर जोर दे रही है.

जुगाड़ कार जैसे कांसेप्ट को अगर व्यावसायिक तौर पर बाजार में उतारा जा सकता है, तो देश के परिवहन क्षेत्र में तेल की खपत में काफी कमी ला सकती है.

रिपोर्ट: विश्वरत्न श्रीवास्तव

संपादक: महेश झा

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