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दुनिया

छात्रों को अवसाद से बचाने की पहल

भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों में अवसाद और आत्महत्या के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. आईआईटी खड़गपुर ने अपने यहां एक परियोजना शुरू की है जो छात्रों को अवसाद से छुटकारा दिलायेगी.

बेहद कड़ी प्रतिस्पर्धा, छात्रों में संवादहीनता की स्थिति, पढ़ाई के साथ दूसरे क्षेत्रों में भी टॉप पर रहने की ललक और नौकरियों में लगातार कटौती की वजह से भारी-भरकम पैकेज के लिए लगातार तेज होती होड़ की वजह से देश के सबसे प्रतिष्ठित भारतीय तकनीकी संस्थानों यानी आईआईटी के छात्रों में अवसाद के मामले बढ़ रहे हैं. आईआईटी परिसर में अवसाद की वजह से आत्महत्या की घटनाएं बढ़ने के बाद अब प्रबंधन ने छात्रों को अवसाद से बचाने की दिशा में पहल की है. पश्चिम बंगाल के खड़गपुर स्थित आईआईटी परिसर ने छात्रों को अवसादमुक्त करने के लिए एक अनूठी योजना शुरू की है.

आईआईटी यानी कामयाबी की गारंटी

आईआईटी को जीवन में कामयाबी की गारंटी माना जाता है. इनमें दाखिले के लिए हर साल आयोजित होने वाली प्रवेश परीक्षा को दुनिया की कठिनतम परीक्षाओं में से एक समझा जाता है. हर साल लाखों छात्र इस परीक्षा में बैठते हैं. लेकिन उनमें से लगभग 10 हजार को ही इन संस्थानों में दाखिला मिल पाता है. आम धारणा यह है कि आईआईटी में दाखिले के बाद जीवन बहुत आसान है और यहां से चार साल बाद इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर निकलने वाले छात्रों को देशी-विदेशी कंपनियां लाखों-करोड़ों के पैकेज देकर हाथों-हाथ लूट लेती हैं. इस धारणा की वजह से ही देश में हजारों करोड़ का कोचिंग उद्योग फल-फूल रहा है.

लेकिन दूर के ढोल सुहावने होते हैं. इन संस्थानों में दाखिला मिलना तो महज एक शुरूआत है. दाखिले के बाद विस्तृत पाठ्यक्रम, कड़ी प्रतिस्पर्धा, पढ़ाई के साथ दूसरी गतिविधियों में हिस्सा लेने और हर सेमेस्टर में बेहतर प्रदर्शन के दबाव में ज्यादातर छात्र हताशा और अवसाद का शिकार हो जाते हैं. पढ़ाई के बोझ के चलते इन छात्रों में एक ही जगह रहने के बावजूद धीरे-धीरे संवादहीनता की स्थिति पैदा हो जाती है. बेहतर ग्रेड नहीं मिलने की स्थिति में लाखों-करोड़ों की नौकरियां तो दूर कुछ हजार रुपए की नौकरी भी नहीं मिलती. यही वजह है कि कालेज का पहला साल बीतते न बीतते छात्रों में हीन भावना पैदा होने लगती है जो उनको अवसाद की ओर धकेलती है. इन तमाम दिक्कतों से बचने के लिए कुछ छात्र आत्महत्या का आसान रास्ता चुन लेते हैं.

बढ़ती आत्महत्याएं

तमाम आईआईटी परिसरों से अक्सर छात्रों की आत्महत्या की खबरें आती रहती हैं. अकेले खड़गपुर में ही इस साल तीन छात्र आत्महत्या कर चुके हैं. आईआईटी के एक पूर्व प्रोफेसर डा. अरुणाभ भट्टाचार्य कहते हैं, "कड़ी प्रतिस्पर्धा और स्कूलों की तरह यहां भी हर क्षेत्र में टॉप करने की मानसिकता की वजह से छात्र अवसाद के शिकार हो जाते हैं." वह बताते हैं कि आईआईटी में आने वाले छात्र अपने-अपने स्कूलों व कक्षाओं के टॉपर होते हैं. लेकिन आखिर आईआईटी में पढ़ाई के दौरान सेमेस्टर की परीक्षा में किसी न किसी को तो अंतिम स्थान पर रहना ही है. इसी से अवसाद की शुरूआत होती है. इसके अलावा हर छात्र पर घरवालों का भारी दबाव होता है. भट्टाचार्य कहते हैं, "आईआईटी में दाखिला मिलते ही हर मां-बाप करोड़ों के पैकेज का सपना देखने लगते हैं. इन सपनों का बोझ छात्रों के लिए भारी साबित होता है."

आईआईटी खड़गपुर के निदेशक पी.पी.चक्रवर्ती भी इसकी पुष्टि करते हैं, वह कहते हैं, "दाखिले के समय अभिभावक सिर्फ प्लेसमेंट व पैकेज के बारे में ही सवाल पूछते हैं. इससे छात्रों पर शुरू से ही अनावश्यक दबाव पैदा हो जाता है." चक्रवर्ती बताते हैं कि इसे ध्यान में रखते हुए अब अभिभावकों के लिए भी एक संक्षिप्त पाठ्यक्रम शुरू करने पर विचार चल रहा है ताकि उनको जमीनी हकीकत से अवगत कराया जा सके. यह पाठ्यक्रम एक दिन का होगा. इसके अलावा छात्रों को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ ऐसे पूर्व छात्रों की सहायता लेने पर भी विचार चल रहा है जिन्होंने अवसादमुक्त होकर जीवन में भारी कामयाबी हासिल की है. ऐसे कुछ छात्रों से संपर्क किया गया है और वह सहायता करने पर सहमत हैं.

अवसादमुक्त करने की पहल

आत्महत्या की लगातार बढ़ती घटनाएओं को देखते हुए आईआईटी खड़गपुर प्रबंधन ने अब छात्रों को अवसादमुक्त करने की दिशा में ठोस पहल की है. इसके तहत रोजाना शाम को एक घंटे तक छात्रावासों में बिजली काट दी जाती है. ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि बिजली नहीं रहने की स्थिति छात्र किताबों से सिर निकाल कर आपस में घुल-मिल सकें. प्रबंधन को उम्मीद है कि इससे उनका तनाव कम करने में सहायता मिलेगी. इस दौरान उनको चाय और काफी की सप्लाई के लिए परिसर में जगह-जगह वेंडिंग मशीनें भी लगाने की योजना है.

आईआईटी खड़गपुर के छात्र मामलों के डीन मनीष भट्टाचार्य कहते हैं, "पढ़ाई के बोझ से छात्रों का आपस में मिलना-जुलना नहीं के बराबर हो पाता है. इससे उनमें एकाकीपन की भावना पैदा होती है जो उनको धीरे-धीरे अवसादग्रस्त कर देती है." वह बताते हैं कि गर्मी की छुट्टी के बाद शुरू होने वाले सत्र में छात्रों के लिए जगह-जगह चाय व काफी की वेंडिंग मशीने भी लगाई जाएंगी. इससे चाय-काफी पीने के बहाने वह लोग आपस में घुल-मिल सकते हैं. अब अगले साल से खुशी और बेहतर तरीके से जीने के विज्ञान पर एक पाठ्यक्रम भी शुरू होगा. फिलहाल संस्थान परिसर में रेखी सेंटर आफ एक्सीलेंट फार द साइंस आफ हैप्पीनेस की ओर से ऐसे कुछ पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं. लेकिन मनीष भट्टाचार्य बताते हैं कि अब इन पाठ्यक्रमों का विस्तार करते हुए छात्रों को अवसाद और दुख पर काबू पाने की कला भी सिखाई जाएगी.

दूसरे कालेजों में भी समस्या

ऐसा नहीं है कि अवसाद की समस्या सिर्फ आईआईटी परिसरों में ही हैं. देश के दूसरे नामी-गिरामी कालेज भी इस समस्या से जूझ रहे हैं. दिल्ली विश्वविद्लाय ने इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिए काउसलिंग के लिए एक माइंड बॉडी सेंटर खोला है. इसके अलावा दो साल पहले एक हेल्पलाइन नंबर भी शुरू किया गया है. इसी तरह जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में स्थित काउंसलिंग सेंटर की ओर से हर सप्ताह एक वर्कशाप आयोजित किया जाता है जहां छात्र अपनी समस्याएं खुल कर रख सकते हैं. वहां हाथोंहाथ उनका समाधान करने का प्रयास किया जाता है. आईआईटी, दिल्ली ने तो अवसाद के मामलों पर अंकुश लगाने के लिए पाठ्यक्रम में बदलाव करते हुए थ्योरी की बजाय प्रैक्टिकल पर ज्यादा ध्यान देने का फैसला किया है.

आईआईटी खड़गपुर की पहल का धीरे-धीरे असर नजर आने लगा है. इससे छात्र खुश हैं. तृतीय वर्ष के एक छात्र सुनील जाजोदिया बताते हैं, "यह बढिया है. बिजली नहीं रहने पर छात्र हॉस्टल से बाहर निकल आते हैं. इस दौरान आपस में बातचीत से कई ग्रंथियां दूर हो जाती हैं और मन भी हल्का हो जाता है." छात्रों का कहना है कि एकाकीपन की वजह से लगता था कि सिर्फ उनको ही क्लास या प्रोजेक्ट वर्क में समस्या हो रही है. लेकिन आपस में बातचीत करने पर पता चलता है कि यह समस्या सबके साथ है. इससे मन को काफी राहत मिलती है और तनाव कम हो जाता है.

रिपोर्टः प्रभाकर

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