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ब्लॉग

छह साल में सत्यम फर्जीवाड़े का फैसला

कार्पोरेट जगत में बड़े पैमाने पर होने वाले फर्जीवाड़ों की जांच के लिए अलग से विशेष अदालतों के गठन की मांग ऐसे फैसलों के आने पर हर बार उठती है. लेकिन समय के साथ वे विचारों के स्तर पर ठंडी भी पड़ जाती हैं.

यह बात सही है कि हर बड़े घोटाले की जांच के लिए सरकारें विशेष अदालतों का गठन तो कर देती हैं लेकिन इनकी कार्यप्रणाली और जांच की गति बताती है कि ये अदालतें सामान्य अदालतों के ढर्रे पर ही काम करती हैं. जांच में समय भी उतना ही लगता है, सामान्य अदालतों से इनमें फर्क सिर्फ इतना होता है कि मामले की सुनवाई हर दिन होने लगती है.

देश दुनिया को चौंका देने वाले सात हजार करोड़ रुपये के सत्यम घोटाला मामले को देखें तो इसकी जांच में छह साल का समय लग गया. विशेष अदालत ने छह साल की जांच में कंपनी के मालिक रामलिंगम राजू सहित सभी दस आरोपियों को सात साल की सजा सुना दी और पांच पांच करोड़ रुपये का जुर्माना लगा दिया. सौ दिन चले अढाई कोस वाली कहावत को याद दिलाने वाले अदालती फैसलों की तरह इस फैसले को भी सजा की कसौटी पर न्यायविदों को कसना होगा. फौरी तौर पर देखा जाए तो सात हजार करोड़ रुपये के घोटाले की जांच में छह साल लगाने के बाद वसूले गए जुर्माने की रकम अगर घोटाले की रकम से कम है तब फिर जांच में क्या खोया और क्या पाया का सवाल उठना लाजिमी है.

घोटाला कंपनी का हो या सरकारी इदारों की गड़बडि़यों का, हर सूरत में जनता की गाढ़ी कमाई को प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर चूना लगता है. आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियों से जूझ रहे देश के लिए घोटालों की दहलीज पर सबसे बड़े खतरे बड़ी कंपनियों ओर औद्योगिक घरानों से है. सरकारों को यह भय हमेशा सताता रहता है कि बड़ी कंपनियों के घोटाले अर्थव्यवस्था को तुलनात्मक रुप से बडा झटका देते हैं. इसके मद्देनजर विधि आयोग की साल दर साल हर सिफारिश में बड़े घोटालों की जांच के लिए देश के सभी राज्यों या व्यापक आर्थिक गतिविधियों वाले प्रमुख राज्यों में फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की बात प्रमुखता से कही जाती है.

लेकिन महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा हो या बड़े आपराधिक मामलों में गठित फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसलों का रिकॉर्ड बहुत प्रभावी नहीं रहा है. दामिनी केस की जांच में भी फास्ट ट्रैक कोर्ट को दो साल लग गए. इसी तरह कुछ अन्य मामलों में भी जांच में औसतन दो साल लगना साबित करता है कि आर्थिक मामलों की जांच प्रक्रिया जटिल होने के कारण फैसला आने में चार से पांच साल लगना लाजिमी होगा. विधि आयोग की रिपोर्ट में इस आधार पर जांच प्रक्रिया के जटिल नियमों को देरी के लिए दोषी ठहराया गया है. आयोग ने सरकार से जांच प्रक्रिया से जुड़े कानूनों को आसान बनाने की सिफारिश की है. सत्यम मामले में 226 गवाहों की गवाही इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कानूनी जटिलताओं को खत्म कर जांच प्रक्रिया को आसान बनाने की मुहिम से उम्मीद की किरण जगती है. सरकार को सजगता से इन मामलों के फैसलों में लगने वाले समय में अर्थव्यवस्था को होने वाले नुकसान को नजर में रखते हुए विधि आयोग की रिपोर्टों का अनुपालन सुनिश्चित कर इस समस्या से निजात पाना समय की मांग है.

ब्लॉग: निर्मल यादव

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