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ब्लॉग

छत खोजता एक स्कूल

आजादी के 65 साल बाद भी भारत में शिक्षा, स्वास्थ्य और भोजन जैसे मूलभूत अधिकारों को जनता तक पहुंचाने की जद्दोजेहद चल रही है. मौलिक अधिकरों की इस जंग में न सिर्फ बड़ों को बल्कि बच्चों को भी जूझना पड़ रहा है.

बात दूरदराज के किसी इलाके की नहीं बल्कि राजधानी की है. दिल्ली को वर्ल्डक्लास और हेरिटेज सिटी बनाने के दावों की हकीकत बयां करता एक सरकारी स्कूल सभी वर्गों की बात करने वाली सरकारों पर भी सवाल खड़ा करता है.

37 साल से कौमी सीनियर सेकंडरी स्कूल अस्थायी इंतजामों से चलते हुए बच्चों का भविष्य संवार रहा है. तमाम सरकारें आईं लेकिन किसी ने इसे एक छत तक मुहैया कराने की जहमत नहीं उठाई. फिलहाल दिल्ली की ऐतिहासिक ईदगाह मस्जिद ने अपने विशालकाय आंगन के एक कोने में स्कूल को पनाह दे रखी है. टीन शेड के नीचे चल रहा स्कूल हर अनजान नजर को उजड़ने की कहानी बताने को बेताब हो जाता है.

बुरे वक्त की कहानी

स्कूल के प्रिंसिपल मुहब्बत अली बताते हैं कि देश में इमरजेंसी के साथ ही स्कूल का बुरा वक्त शुरू हुआ, जो लगभग 90 फीसदी सरकारी मदद से चलता था. राजधानी में जमीन की मालिक दिल्ली विकास प्राधिकरण डीडीए से सराय खलील इलाके में मिली जमीन पर पांचमंजिला इमारत में स्कूल चल रहा था. अचानक डीडीए ने इलाके में आवासीय कालोनी बनाने के नाम पर स्कूल को जमीन खाली करने का फरमान जारी कर दिया. आखिरकार विस्थापित किए जाने की शर्त पर 30 जून 1976 को स्कूल की इमारत ढहा दी गई. उसके बाद आपातकाल हट गया लोकतांत्रिक अधिकार भी बहाल हो गए लेकिन स्कूल से किए गए वादे सरकारी फाइलों में दब कर रह गए.

Schulkinder in Indien

जैसे तैसे चलता एक स्कूल

सियासत के शिकार बच्चे

स्कूल शुरू करने से लेकर उसके विस्थापन की पीड़ा तक से जुड़े शिक्षाविद फिरोज अहमद बख्त बताते हैं कि स्कूल को ढहाने वाला आदेश डीडीए के तत्कालीन आयुक्त बीआर टमटा ने जारी किया था. जो उस समय कांग्रेस के सर्वेसर्वा संजय गांधी और जगमोहन के काफी करीबी थे. आरोप रहे हैं कि मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए सराय खलील में इतनी बड़ी जनता आवासीय योजना जगमोहन की सलाह पर संजय गांधी ने तैयार कराई थी. शायद उन्हें मालूम था कि बच्चे वोट नहीं देते इसलिए इन्हें विस्थापित कर घर के बदले वोट हासिल करना आसान है. बख्त कहते हैं कि बच्चे सियासत के आसान शिकार बन गए.

वक्त बीता. जनता फ्लैट भी बन कर आबाद हो गए, सरकारें आती जाती रहीं. लेकिन स्कूल की किस्मत में कोई बदलाव नहीं आया. बख्त के मुताबिक बीते 15 सालों से दिल्ली में सरकार चला रही मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और केन्द्र में 10 साल से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास स्कूल को जगह दिलाने की मांग उठाई जा चुकी है. साथ ही दिल्ली के प्रशासनिक प्रमुख के नाते उप राज्यपाल के समक्ष भी मामला कई बार उठाया गया लेकिन हर तरफ से आश्वासन के सिवाय कुछ नहीं मिला. दिल्ली की शिक्षा मंत्री किरण वालिया ने स्कूल के साथ 37 साल से हो रहे सुलूक पर अफसोस जताते हुए कहा कि उनकी सरकार स्कूल का अनुदान बिना किसी लेटलतीफी के जारी कर रही है. जमीन के लिए डीडीए जिम्मेदार है और सरकार की सीमाएं यहां खत्म हो जाती हैं.

सिक्के का दूसरा पहलू

मजे की बात यह है कि दिल्ली सरकार ने पिछले 20 साल में सैकड़ों पब्लिक स्कूल खोलने के लिए निजी संस्थाओं को बेशकीमती जमीन मात्र एक रुपये में डीडीए से दिलवाई है. ये स्कूल गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने का वादा पूरा नहीं कर रहे हैं और मामला दिल्ली हाई कोर्ट में चल रहा है. वहीं दूसरी तरफ सरकार अपने ही एक स्कूल के लिए नियमों की लक्ष्मणरेखा का हवाला देकर खुद को अलग कर लेती है.

Schulkinder in Indien

भविष्य और इमारत तलाशते बच्चे

मुहब्बत अली कहते हैं कि अगर इस स्कूल में गरीबों के बजाय अमीरों के बच्चे पढ़ रहे होते तो शायद ये दिन न देखने पड़ते, "इसके बावजूद स्कूल का हर साल रिजल्ट शत प्रतिशत रहता है. सरकार को समझना चाहिए कि बच्चों को अगर पढ़ने के माकूल हालात मिलें तो परिणाम कितना अच्छा हो सकता है."

कहीं से कोई उम्मीद न देख बच्चों ने अब स्कूल को छत दिलाने की इस कवायद में खुद को शामिल करने का फैसला कर लिया है. बख्त बताते हैं कि स्कूल में 725 बच्चे पढ़ रहे हैं. चिलचिलाती धूप, कंपा देने वाली ठंड और बारिश यानी साल भर मौसम की मार झेल कर किसी तरह पढ़ने को मजबूर बच्चों ने नवनियुक्त उप राज्यपाल नजीब जंग को अपने हाथों से चिट्ठी लिखकर भेजी है. दरअसल बच्चों को पता चल गया है कि मस्जिद प्रशासन ने भी अब ईद से पहले स्कूल कहीं और ले जाने का नोटिस प्रिंसिपल साहब को थमा दिया है.

बच्चे नहीं हैं नाउम्मीद

दसवीं के छात्र नजरे आलम रिक्शाचालक के बेटे हैं और सीबीएसई बोर्ड परीक्षा की तैयारी में जुटे हैं. आलम की चिंता है कि साल भर में पढ़ाई का तमाम समय मौसम की मार से जूझते बीतता है, इसके बाद भी परीक्षा में बैठने का मौका मिल जाता था. लेकिन ईदगाह से भी अगर स्कूल हट गया तो मौका नहीं मिलेगा. इसी चिंता ने बच्चों को अपने हक के लिए पहल करने को मजबूर किया. हालांकि आलम को यकीन है कि नए उप राज्यपाल जंग साहब खुद शिक्षाविद हैं इसलिए बच्चों के दर्द को समझेंगे और उनकी फरियाद बेकार नहीं जाएगी.

मासूम हमजा कुरैशी और अदनान के नितांत गैरसरकारी और बेहद सामान्य भाषा में लिखे गए शब्द जंग साहब के दिल दिमाग पर कितना असर डाल पाएंगे यह तो पता नहीं लेकिन बच्चों की पहल साबित करती है कि व्यवस्था के हर पायदान पर जम चुकी काहिली की अनगिनत परतें मासूम मन की उड़ान को नहीं रोक सकती.

ब्लॉगः निर्मल यादव, नई दिल्ली

संपादनः अनवर जे अशरफ