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ब्लॉग

चुनाव से पहले बढ़ता दलबदल

हर बार की तरह इस बार भी चुनाव नजदीक आते ही दल-बदल और दल-त्याग की घटनाएं होने लगी हैं. बहुत से राजनीतिज्ञों के लिए चुनाव से ठीक पहले पार्टी बदलना मनचाहा टिकट पाने का सुरक्षित रास्ता बनता जा रहा है.

भारतीय राजनीति से विचारों की विदाई हुए बहुत लंबा समय बीत चुका है, इसलिए जब चुनाव में पार्टी का टिकट न मिलने पर कोई अपनी पार्टी छोडता है तो आश्चर्य नहीं होता. इस बात पर कोफ्त जरूर होती है कि छह दशक से अधिक समय के लोकतंत्र के अनुभव ने हमारे देश को कहां लाकर खड़ा कर दिया है. यह भी एक विस्मयकारी बात है कि चुनाव की घोषणा होने के बाद लागू होने वाली आदर्श आचार संहिता का दल बदलने की घटनाओं पर कोई असर नहीं होता. दल बदलने वालों पर अंकुश लगाने या नई पार्टी में शामिल होते ही उसके मनचाहे चुनाव क्षेत्र से टिकट पाने पर किसी तरह की रोक लगाने की कोशिश भी नजर नहीं आती. न अदालतों की ओर से और न ही निर्वाचन आयोग की ओर से.

पार्टी के प्रति उसकी विचारधारा या राजनीतिक मूल्यों के कारण प्रतिबद्धता अब केवल हंसी-मजाक की चीज बनकर रह गई है. तात्कालिक राजनीतिक लाभ ही सबसे बड़ी चीज है. हाल ही में दलित नेता उदितराज, जिन्होंने कुछ वर्ष पहले बौद्ध धर्म अंगीकार करते समय अपना मूल नाम रामराज छोड़कर यह नाम अपनाया था और जो हिन्दू धर्म के बारे में भीमराव अंबेडकर के विचारों को मानते थे, हिंदुत्ववादी भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. डीएमके के सर्वोच्च नेता करुणानिधि के बड़े पुत्र अलागिरी लोकसभा चुनाव में टिकट न मिलने और पिता द्वारा छोटे पुत्र स्टालिन को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाने के कारण अपनी अलग ही पार्टी बनाने की सोच रहे हैं.

उधर अजित सिंह के कट्टर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मुलायम सिंह यादव के खास सिपहसालार रह चुके अमर सिंह अब फिल्म अभिनेत्री जयप्रदा के साथ अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोक दल में शामिल हो गए हैं. भाजपा में फिर से लौटे कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा अपने एक नजदीकी का टिकट कटता देखकर पार्टी नेतृत्व को एक बार फिर आंखें दिखा रहे हैं. राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव का दायां हाथ माने जाने वाले रामकृपाल यादव को पटना से लोकसभा का टिकट नहीं मिला तो अचानक उन्हें पार्टी में परिवारवाद नजर आने लगा क्योंकि इस सीट पर लालू यादव अपनी पुत्री मीसा यादव को खड़ा कर रहे हैं. रामकृपाल को तब परिवारवाद नजर नहीं आया जब चारा घोटाले में पहली बार जेल जाते समय लालू यादव ने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को, जो राजनीति से दूर नितांत घरेलू महिला थीं, अचानक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया था और पार्टी में अपने सालों को प्रमुखता दी थी. लेकिन तब उनकी महत्वाकांक्षाएं पूरी हो रही थीं इसलिए उस समय उन्हें परिवारवाद दिखा ही नहीं. राजनीतिक अवसरवाद की यह सूची लगभग अंतहीन है.

Indien Parlamentswahlen Archiv 2004

चुनाव में भागीदारी, लेकिन पार्टी में लोकतंत्र नहीं

‘आयाराम गयाराम' का यह खेल भारतीय राजनीति में 1967 में खुलकर खेला जाना शुरू हुआ जब दल बदलने और पार्टी तोड़ने की अनेक घटनाएं एक साथ घटीं. इसके बाद तो ऐसी घटनाएं आम हो गईं. ये घटनाएं अधिकांशतः चुनाव के समय टिकट वितरण और चुनाव के बाद सरकार बनाने के अवसर पर ही होती हैं. अक्सर सरकार गिराने के लिए भी पार्टियों में विभाजन होता है. इसी प्रवृत्ति को रोकने के लिए 1985 में दल-बदल विरोधी कानून बनाया गया लेकिन इससे समस्या का समाधान नहीं हो पाया. समाजवादी नेता और चिंतक मधु लिमये का कहना था कि यह कानून ‘थोक दल-बदल' को वैध बनाता है. दरअसल दल-बदल की समस्या के कुछ ऐसे पहलू भी हैं जिन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि हर स्थिति में दल-बदल अवसरवाद या महत्वाकांक्षा या लोभ के कारण ही होता हो, ऐसा भी नहीं है. इसके मूल में कहीं-न-कहीं भारतीय लोकतंत्र में स्वीकृत पार्टी प्रणाली भी है, और साथ ही राजनीतिक पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव भी.

इस समय कम्युनिस्ट पार्टियों और भारतीय जनता पार्टी जैसी कुछेक पार्टियों के अलावा अधिकांश राजनीतिक दल एक नेता और उसके परिवार की निजी संपत्ति बन गए हैं. इनमें दलीय चुनाव केवल निर्वाचन आयोग के निर्देश का औपचारिक रूप से पालन करने के लिए होते हैं ताकि दल की मान्यता रद्द न हो. लेकिन ये वास्तविक चुनाव नहीं होते जिनमें उम्मीदवार बिना झिझक के किसी के भी खिलाफ खड़ा हो सके तो गुप्त मतदान के जरिये चुनाव हो. ऐसी पार्टियों में नेता केवल एक सीमा तक ही अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं. वे कभी भी सर्वोच्च नेता के खिलाफ अपनी राय जाहिर नहीं कर सकते. नतीजतन उनके भीतर असंतोष और आक्रोश बढ़ता जाता है और वह ऐसे समय उग्र होकर बाहर निकलता है जब उनके अपने राजनीतिक हितों पर चोट हो रही हो. इसी तरह भारत की संसद और राज्य विधानसभाओं में सदस्य अपनी पार्टी के खिलाफ वोट नहीं दे सकते जबकि ब्रिटेन और अमेरिका में ऐसा नहीं है. विंस्टन चर्चिल, एंथनी एडेन, हैरोल्ड मैकमिलन, हैरोल्ड विल्सन, जिम्मी कैलहन और मार्गरेट थैचर जैसे सांसदों ने, जो बाद में चलकर प्रधानमंत्री भी बने, ब्रिटेन की संसद में अपनी पार्टियों के खिलाफ कई बार वोट डाला. लेकिन भारतीय व्यवस्था ऐसी है कि यदि कोई सांसद ऐसा करे तो उसकी संसद की सदस्यता तत्काल समाप्त हो जाती है.

लेकिन इन कमियों को दूर करने के बारे में भारत का राजनीतिक वर्ग सोचने को तैयार नहीं है. इसीलिए नग्न अवसरवाद और मूल्यहीनता का खुला खेल चल रहा है. चुनाव के समय इसमें और भी अधिक तेजी आ जाती है.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा

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