चुनाव पर है तुर्की के राष्ट्रपति की नजर | दुनिया | DW | 29.07.2015
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दुनिया

चुनाव पर है तुर्की के राष्ट्रपति की नजर

तुर्की ने काफी आनाकानी के बाद आईएस के ठिकानों पर हमला शुरू किया, लेकिन साथ ही कुर्द विद्रोही संगठन पीकेके के ठिकानों पर भी. अमेरिका ने इसे उचित ठहराया है तो यूरोप में तुर्की की नई नीति को संदेह से देखा जा रहा है.

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राष्ट्रपति रेचेप तय्यप एरदोवान

हंगरी का उदारवादी अखबार 'नेप्जाबादजाग' तुर्की की कुर्द नीति और यूरोप में आ रहे शरणार्थियों की बड़ी संख्या में संबंध देखता है. उसका कहना है, "जब तुर्की और सीरिया की सीमा पर युद्ध होगा तो सर्ब-हंगेरियन सीमा से ज्यादा शरणार्थी आएंगे. यह हंगरी की सामाजिक व्यवस्था पर कब्जे के लिए लोगों का संगठित आप्रवासन नहीं है."

नाटो ने आईएस के खिलाफ संघर्ष में तुर्की के साथ एकजुटता दिखाई है लेकिन साथ ही बहुत से सदस्य देशों ने अंकारा से अपील की है कि वे कुर्दों के साथ समझौते की कोशिश ना छोड़ें. लेकिन कुर्दों के साथ शांति प्रक्रिया को रोक कर एरदोवान ने इसके उलट संकेत दिया है. हंगरी का अखबार लिखता है, "उनकी पार्टी पिछले चुनावों में बहुमत खो चुकी है, वे संविधान बदल नहीं सकते, सर्वाधिकार संपन्न राष्ट्रपति नहीं हो सकते. इतना ही नहीं वामपंथी कुर्द पार्टी को 13 प्रतिशत मत मिले. एरदोवान असल में उनके खिलाफ लड़ रहे हैं क्योंकि उन्हें जल्द ही नए चुनाव और उसमें बहुमत जीतने की उम्मीद है."

Karte Türkische Angriffe gegen IS in Syrien und Kurdische Stützpunkte im Nord-Irak ENG

सीरिया में आईएस और इराक में कुर्द ठिकानों पर तुर्की के हमले

जर्मनी के अखबार भी अब तक आईएस के शह दे रहे एरदोवान की बदली हुई नीति में घरेलू राजनीतिक संघर्ष की परछाईं देखते हैं. बर्लिन के दैनिक 'बर्लिनर साइटुंग' ने पीकेके पर तुर्की के हमले के बारे में लिखा है, "सैन्य रूप से यह गलती है क्योंकि अब तक इराकी कुर्द पीकेके की मदद के साथ आईएस के खिलाफ प्रभावी संघर्ष कर रहे हैं. दरअसल एरदोवान ने पीकेके के साथ मुश्किल लेकिन उम्मीदों वाली शांति प्रक्रिया को अपनी ताकत बढ़ाने के लिए रोक दिया है. असुरक्षा के माहौल में एरदोवान और दोवुतोग्लू को उम्मीद है कि मतदाता शांति और व्यवस्था के लिए फिर से एकेपी की बहुमत सरकार चाहेंगे. यदि ऐसा होता है तो यह तुर्की में लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह होगा."

बर्लिन के दैनिक 'टागेस्श्पीगेल' ने भी पीकेके पर एरदोवान की कार्रवाई पर टिप्पणी की है. अखबार लिखता है, "जब जर्मनी ने कुर्दों को (आईएस से लड़ने के लिए) हथियार दिए तो साफ था कि वे आईएस के खिलाफ कामयाबी के बाद वापस नहीं देंगे बल्कि बाद में कट्टरपंथी पीकेके की ही तरह अपने राष्ट्रीय मकसद स्वायत्तता या स्वतंत्र राज्य के लिए लड़ेंगे. ये भी साफ था कि कुर्द सिर्फ आत्मरक्षा या यजीदियों के साथ सहानुभूति के लिए नहीं लड़ रहे हैं बल्कि बाद में वे राजनीतिक मदद के रूप में बदला भी चाहेंगे. कुर्दों पर पश्चिम और जर्मनी का अब यह कर्ज है. जर्मनी को कुर्द राज्य का समर्थन करने की जरूरत नहीं है. सांस्कृतिक और सीमित राजनीतिक स्वायत्तता समाधान हो सकते हैं."

ड्रेसडेन से प्रकाशित होने वाले 'जैक्सिशे साइटुंग' का कहना है कि एरदोवान भले ही हाल के आतंकी हमलों के मद्देनजर अपनी कार्रवाई को उचित ठहराएं, लेकिन वे आईएस के खिलाफ लड़ाई का पीकेके के खिलाफ कार्रवाई के लिए दुरुपयोग कर रहे हैं. अखबार एरदोवान के आंकलन के बारे में लिखता है, "यदि वे आईएस को रोक पाते हैं और इस तरह कमजोर करते हैं तो इससे पीकेके मजबूत होगा, सिर्फ इराक और सीरिया में ही नहीं बल्कि तुर्की में भी. और चूंकि एरदोवान को यह डर है, उन्होंने पीकेके के साथ शांति प्रक्रिया को हल्के और फौरी तरीके से रोक दिया है."

व्यापार मेलों के शहर हनोवर से प्रकाशित दैनिक 'हनोवर्शे अलगेमाइने साइटुंग' ने लिखा है, "फिर से जन्मे अमेरिकी-तुर्की सहयोग की भारी कीमत है. एरदोवान ने पीकेके के साथ शांति प्रक्रिया समाप्त कर दी है और उसके कुछ ठिकानों पर बमबारी की है. उनका हमला सीमा की सुरक्षा के ही लिए नहीं बल्कि कुर्दों के बढ़ते आत्मविश्वास पर है जो अपने खुद के राज्य को करीब आता देख रहे हैं. कुर्दों ने ऐसा दर्जा हासिल कर लिया है कि दूरगामी रूप से इलाके में नक्शे को बदलने की उम्मीद की जा सकती है. उनकी दृढ़ता के बिना आईएस के खिलाफ अमेरिकी बमबारी का कोई असर नहीं होता."

एमजे/आरआर (एएफपी)

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