चुनाव के बाद यूरोपीय संघ की चुनौतियां | दुनिया | DW | 26.05.2014
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दुनिया

चुनाव के बाद यूरोपीय संघ की चुनौतियां

यूरोपीय संसद के लिए संघ के 28 देशों में हुए चुनावों के बाद इस साल नया यूरोपीय आयोग भी चुना जाएगा. यूरोपीय संघ के सामने ढेर सारी नई चुनौतियां हैं. इस बीच संघ के प्रमुख पदों के लिए जोड़ तोड़ शुरू हो गई है.

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पदों की होड़

संसदीय चुनावों के बाद तय होने वाले पदों में संसद प्रमुख के अलावा यूरोपीय आयोग के प्रमुख और कमिसारों का पद भी है. इसके अलावा मंत्रि परिषद का अध्यक्ष भी चुना जाएगा. मौजूदा अध्यक्ष हैर्मन फान रोमपॉय का कार्यकाल नवंबर में खत्म हो रहा है. और इन सारे पदों को चुनने का अंतिम फैसला सदस्य देशों की सरकारें करेंगी लेकिन इस चुनाव में पूरब, पश्चिम, उत्तर दक्षिण, समाजवादी और अनुदारवादी तथा महिला और पुरुषों के अनुपात का भी ख्याल रखना होगा. पदों के अलावा यूरोपीय संघ की सबसे बड़ी चुनौती नीतियों के क्षेत्र में होगी.

हालांकि यूरोप के कर्ज संकट की समस्या बहुत हद तक निबट चुकी है, लेकिन ग्रीस का भविष्य अभी भी चिंता की वजह है. युवा बेरोजगारी और विकास गति का धीमा विकास सबसे बड़ी समस्या है. कई देशों में कर्ज का विशाल बोझ बना हुआ है जबकि सदस्य देशों में प्रतिस्पर्धी क्षमता लाने पर काम करना होगा. फ्रांस जैसी संघ की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था सुधारों को लागू करने में मुश्किलों का सामना कर रही है.

तनावपूर्ण स्थिति

यूरोपीय संघ को विदेश और सुरक्षा नीति में अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट का सामना करना पड़ रहा है. संघ के पूरब और दक्षिण में स्थिति काफी तनावपूर्ण है. यूक्रेन के राजनीतिक संकट और उसके बाद रूस के साथ पैदा हुए विवाद के राजनीतिक और आर्थिक नतीजों से यूरोपीय संघ को लंबे समय तक जूझना होगा. यूरोप के दक्षिण में लीबिया में स्थिति अस्थिर बनी हुई है. वहां से बड़ी संख्या में शरणार्थी यूरोप आ रहे हैं. मध्य सागर होकर आने वाले शरणार्थियों की समुद्र में डूबकर होने वाली मौत यूरोपीय संघ की शरणार्थी नीति पर सवालिया निशान खड़ा कर रही है.

Griechenland Protest & Streik 9. April 2014

ग्रीस का साया

तेल और गैस की आपूर्ति करने वाले रूस के साथ हुए विवाद के बाद यूरोपीय देश ऊर्जा की आपूर्ति की सुरक्षा पर बहस कर रहे हैं. यूरोपीय संघ को इसकी गारंटी करनी होगी कि पड़ोस में विवाद के बावजबद वह अपनी ऊर्जा की जरूरतों को वैकल्पिक स्रोतों से पूरा कर पाएगा. इस सिलसिले में अक्षत ऊर्जा के उत्पादन को बढ़ावा देने के अलावा यूरोपीय ऊर्जा नेटवर्क में अरबों के निवेश की जरूरत होगी. इसके अलावा यूरोपीय देशों को 2030 तक के लिए अपने पर्यावरण रक्षा लक्ष्यों पर भी सहमत होना होगा. सदस्य देशों के बीच इस पर भारी मतभेद हैं.

डाटा सुरक्षा नियम

यूरोपीय देशों को अपना नया डाटा सुरक्षा नियम भी तय करना होगा. संघ के डाटा सुरक्षा नियम 1995 के बने हैं, जब दुनिया भर में सक्रिय गूगल जैसी बड़ी इंटरनेट कंपनियों का बाजार पर वर्चस्व कायम नहीं हुआ था. सुधारों के बारे में संघ के देशों में 2012 से बहस हो रही है, लेकिन अब तक सहमति नहीं हो पाई है. इंटरनेट कंपनियों के अलावा अमेरिकी खुफिया एजेंसी एनएसए जैसे संगठनों के डाटा जमा करने की आदत से बहुत से यूरोपीय नागरिक असुरक्षित महसूस कर रहे हैं.यूरोपीय संघ अमेरिका से इस मसले पर ज्यादा रियायतें पाने की कोशिश कर रहा है.

साथ ही यूरोपीय संघ ने अमेरिका के साथ मुक्त व्यापार संधि पर बातचीत शुरू की है. इस समझौते का समर्थन कर रहे लोग अर्थव्यवस्था के लिए इसके फायदे गिनाते हैं जबकि इसके आलोचकों का कहना है कि समझौते से उपभोक्ता और पर्यावरण सुरक्षा मानकों में भारी कटोती होगी. एनएसए के पूर्व कॉन्ट्रैक्टर एडवर्ड स्नोडेन के इस खुलासे के बाद कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी ने चांसलर अंगेला मैर्केल के मोबाइल फोन पर भी निगाह रखी, डाटा सुरक्षा को लेकर लोग अत्यंत संवेदनशील हो गए हैं.

कर्ज संकट और उसके कारण सरकारी खर्च में आम लोगों और सुविधाओं की कीमत पर कटौती के बाद नागरिकों में यूरोपीय संघ की छवि अत्यंत खराब हुई है. इसका असर चुनाव के नतीजों पर भी दिखा है, जिसमें यूरोप आलोचक पार्टियों के मतों में वृद्धि हुई है. साथ ही यूरोप का विरोध करने वाले सांसदों की तादाद बढ़ी है. आने वाले सालों की यूरोपीय संस्थानों की सबसे बड़ी चुनौती होगी लोगों का खोया हुआ विश्वास फिर से जीतना. इसी के साथ यूरोपीय संघ के भावी कर्तव्यों और अधिकारों पर होने वाली बहस भी जुड़ी हुई है. संघ के ढांचे में सुधार की मांगे और जोर पकड़ेंगी.

एमजे/आईबी (एएफपी)

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