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जर्मन चुनाव

चुनावी कारोबार में चांदी ही चांदी

बहुत पुरानी कहावत है, कोऊ नृप नृप होय, हमें का हानि. लोकसभा चुनावों के मौके पर कुछ लोगों पर यह एकदम सटीक साबित हो रही है. अबकी लोकसभा चुनावों में चाहे कोई भी हारे या जीते, ऐसे लोगों की जीत तो तय है.

ये लोग हैं चुनावों के मौके पर चुनाव प्रचार से संबंधित सामग्री बनाने वाले. लोकसभा चुनावों के इस सीजन में तमाम राजनीतिक दलों और उनके उम्मीदवारों के साथ यह लोग भी काफी व्यस्त हैं. चुनावी मैदान में प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों ने भले एक दूसरे के खिलाफ आस्तीनें चढ़ा रखी हों, इनकी दुकानों में भाईचारे और सद्भाव की अद्भुत मिसाल देखने को मिलती है. यह पूरा कारोबार करोड़ों का है. इसमें अब चीन में बने पोस्टर और बैनर भी शामिल हो गए हैं. ज्यादा ऑर्डर मिलने की वजह से महानगर कोलकाता के थोक व्यापारी चीनी कंपनियों को आर्डर दे देते हैं. भारतीय उत्पादों के मुकाबले चीनी सामान सस्ते भी हैं.

दिन रात की मेहनत

प्रचार सामग्री की मांग पूरी करने के लिए ये दिन रात काम कर रहे हैं. विभिन्न राजनीतिक दलों के झंडों, छातों, टी शर्ट और टोपियों के अलावा यह लोग कई दूसरी चीजें भी बना रहे हैं. महानगर के बड़ाबाजार इलाके के प्रिंटर बीरेन साहा बताते हैं, "मैं लगभग 20 वर्षों से इस पेशे में हूं. लेकिन यह मेरे जीवन का सबसे दिलचस्प चुनाव है. ऐसे में अबकी चुनावी सीजन में बढ़िया कारोबार की उम्मीद है." वह बताते हैं कि दुकान में काम करने वाले दो दर्जन कलाकारों को दम मारने तक की फुर्सत नहीं.

महानगर के दूसरे प्रिंटरों की भी यही स्थिति है. तमाम दलों की विभिन्न उम्मीदवार अपने बैनर, पोस्टर और पर्चों का ऑर्डर दे रहे हैं. ऑर्डर की भरमार की वजह से कई प्रिंटरों ने अब अपने हाथ खड़े कर दिए हैं. धीरेन मंडल बताते हैं, "मैं अब और ऑर्डर नहीं ले सकता. पहले ही काफी मिल चुका है. तय समय के भीतर माल की डिलीवरी देना एक चुनौती है." तमाम प्रमुख दलों की उम्मीदवारों की सूची जारी होने के बाद कोलकाता के अलावा अब तो विभिन्न जिलों से भी ऑर्डर मिलने लगे हैं. राजनीतिक दलों के चुनाव चिह्न और नेताओं के कटआउट बनाने वाले एक कारीगर मनोज पाल कहते हैं, "पहला ऑर्डर तृणमूल कांग्रेस की ओर से मिला था. उनको इतना ऑर्डर मिला, जिसे समय पर पूरा करने के लिए एक दर्जन कारीगरों को दिन रात काम करना पड़ रहा है."

पोस्टरों और बैनरों की लगातार बढ़ती मांग की वजह से इस बार कई प्रिंटरों को नई मशीनें खरीदनी पड़ी हैं. इसके अलावा कुछ सामान चीन से भी मंगाया जा रहा है. प्रिंटर बीरेन साहा कहते हैं, "हमारे लिए सभी राजनीतिक दल समान हैं. कुछ उत्पादों की कीमतें सबके लिए बराबर हैं."

मिठाई भी बनी

चुनाव के मौके पर कोलकाता के एक पुराने मिठाई निर्माता ने चारों प्रमुख राजनीतिक दलों के चुनाव चिह्नों वाली मिठाई भी बनाई है. दुकान के मालिक सुदीप मलिक कहते हैं, "तमाम दलों के समर्थक और कार्यकर्ता भारी तादाद में इनका ऑर्डर दे रहे हैं. लोग इसे अपने परिचितों और मित्रों में तो बांट ही रहे हैं, चुनावी रैलियों में भी इसे बांटा जा रहा है."

वैसे पिछले विधानसभा चुनावों के मुकाबले इन उत्पादों की कीमतों में इजाफा हुआ है. पहले विभिन्न राजनीतिक दलों के जिन झंडों और टोपियों की कीमत 10 रुपये थी, अब वह 20 रुपये हो गई है. कच्चे माल के साथ मजदूरी भी बढ़ी है. लेकिन तकनीक की प्रगति की वजह से अब कम समय में ही कंप्यूटर की सहायता से बेहतर पोस्टर और बैनर बनाना संभव हो गया है.

इन व्यापारियों को सबसे बड़ा ऑर्डर अगर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस से मिला है तो बाकी दल भी ज्यादा पीछे नहीं हैं. ऐसे में उम्मीदावरों के भाग्य का फैसला होने से पहले ही इन लोगों की तिजोरियां भरने लगी हैं. यानी हार जीत चाहे किसी भी राजनीतिक दल की हो, इन लोगों की तो चांदी है.

रिपोर्टः प्रभाकर, कोलकाता

संपादनः ए जमाल

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