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विज्ञान

चुंबकीय इलाज से खून की सफाई

वैज्ञानिकों ने एक ऐसा उपकरण विकसित किया है जिसकी मदद से इबोला या कोई अन्य खतरनाक वारयस हो, बैक्टीरिया हो या दूसरे हानिकारक तत्व, इन्हें चुंबक के जरिए खून से निकाला जा सकेगा.

इस उपकरण की मदद से शरीर को सूक्ष्म जीवों से मुक्त कर स्वस्थ रखने में मदद मिलेगी. वैज्ञानिक उम्मीद कर रहे हैं कि इसकी मदद से इबोला जैसे वायरस को भी खून से निकाला जा सकेगा. अभी तक इस उपकरण को सिर्फ चूहों पर ही इस्तेमाल किया गया है. इस तकनीक में चुंबक की नैनोबीड्स पर जेनेटिक इंजीनियरिंग से गुजरे हुए मानव रक्त प्रोटीन एमबीएल की परत होती है. यह एमबीएल रक्त में हानिकारक तत्वों और परजीवियों से चिपक जाता है. इसके बाद इसे चुंबक की मदद से बाहर निकाला जा सकता है.

रक्त की सफाई

साइंस की पत्रिका नेचर मेडिसिन में छपी रिपोर्ट के मुताबिक इस तकनीक में जैव प्लीहा का इस्तेमाल खून में होने वाले संक्रमण या हानिकारक तत्वों की सफाई के लिए किया जाता है. खून में होने वाले संक्रमण से हर साल दुनिया भर की 1.8 करोड़ आबादी प्रभावित होती है. इनमें से 30 से 50 फीसदी लोग जान से हाथ धो बैठते हैं. जिन सूक्ष्म जीवों के कारण यह होता है उनमें ज्यादातर एंटीबायोटिक के लिए प्रतिरोधी क्षमता होती है, ये तेजी से फैलते हैं.

रिपोर्ट को लिखने वाले डोनाल्ड इंगबर के मुताबिक अगर यह तकनीक इंसानों के लिए भी सुरक्षित साबित होती है तो बड़े बड़े खतरों से आसानी से निपटा जा सकेगा. जैव प्लीहा की मदद से उनके खून की आसानी से सफाई हो सकेगी. इसके बाद साफ खून को शरीर के रक्त संचार तंत्र में वापस भेज दिया जाता है. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर इंगबर मानते हैं कि इस इलाज का इस्तेमाल परजीवी के बारे में पूरी तरह पता होने से पहले या मरीज का एंटीबायोटिक इलाज करने से पहले भी किया जा सकता है.

इबोला का इलाज

इंगबर ने बताया कि एमबीएल प्रोटीन इबोला वायरस को आसानी से पकड़ लेते हैं इसलिए इस दिशा में इसे एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है. मानव पर टेस्ट के बाद पता चलेगा कि क्या इसे इबोला के मरीजों के इलाज में इस्तेमाल किया जा सकता है.

बताया जा रहा है कि एमबीएल एचआईवी वायरस से भी चिपक जाता है. रिपोर्ट के मुताबिक जीवित चूहों को स्टैफाइलोकोकस ऑरियस जैसे खतरनाक बैक्टीरिया से संक्रमित किया गया था. इसके बाद इस उपकरण के इस्तेमाल से उनके खून में से 90 फीसदी बैक्टीरिया को अलग किया जा सका. इंगबर ने बताया कि इलाज के लिए जैव प्लीहा के इस्तेमाल से पहले इन टेस्टों को बड़े जीवों और फिर इंसानों पर किए जाने की जरूरत है. उसके बाद ही इसके इस्तेमाल पर कोई फैसला लिया जा सकता है.

एसएफ/एएम (एएफपी)


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