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ताना बाना

चीन पर लगे आरोपों का एक और पहलू

चीन पर हमेशा आरोप लगते हैं कि वह अफ्रीकी देशों में तानाशाही का समर्थन करता है. लेकिन हाल ही में नॉर्वे में एक अध्ययन हुआ है जो कुछ और ही कहता है. इसके मुताबिक चीन का ज्यादातर कारोबार लोकतांत्रिक देशों के साथ है.

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दक्षिण अफ्रीका में हू चिन ताओ

लंबे समय तक अफ्रीका महाद्वीप के लोकतांत्रिक देश किसी भी तरह की मदद के लिए अमेरिका की ओर ही देखते रहे हैं. लेकिन जब से नया खिलाड़ी यानी चीन मैदान में आया है, पासे बदल गए हैं. माना जाता है कि चीन तानाशाहों के बीच ज्यादा पंसद किया जाता है क्योंकि वह मानवाधिकार या प्रशासन के बारे में उलटे सीधे सवाल नहीं करता. पश्चिमी मीडिया भी चीन पर आरोप लगाता रहता है कि वह अफ्रीका में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत नहीं होने देता.

नॉर्वे यूनिवर्सिटी फॉर साइंस एंड टेक्नॉलजी (एनटीएनयू) में पढ़ाने वाले राजनीतिक वैज्ञानिक इंद्रा डे सोयसा और पॉल मिडफर्ड ने इस तथ्य के सारे पहलू जानने की कोशिश की. उन्होंने खासतौर पर हथियारों की सप्लाई को अपने अध्ययन का आधार बनाया. उन्होंने 1989 से 2008 के बीच चीन और अमेरिका की हथियार सप्लाई की तुलना की. वे लोग नतीजों से खुद ही हैरान रह गए.

सोयसा ने डॉयचे वेले से कहा, "हमें पता चला कि अमेरिका के मुकाबले चीन का व्यापार तानाशाहों के साथ काफी कम है. चीन असल में लोकतांत्रिक देशों को अहमियत देता है. उसके व्यापारिक संबंध जांबिया जैसे देशों के साथ हैं जबकि अमेरिका की प्राथमिकता मिस्र जैसे देश हैं जो लोकतंत्र के पैमाने पर अच्छे नहीं माने जाते." 1989 से 2008 के बीच मिस्र ने अपने कुल हथियारों का 90 फीसदी हिस्सा अमेरिका से लिया. मध्य पूर्व के अपने संबंधों के लिहाज से अमेरिका मिस्र को अहम साझीदार मानता या बताता है.

चीन हथियार बेचने के लिए बस मांग देखता है. वह तो सूडान जैसे देश को भी हथियार देता है जिसकी पश्चिमी देश जमकर आलोचना करते हैं. लेकिन वह बाकी देशों से फिर भी पीछे हैं. आंकड़े कहते हैं कि 2001 से 2008 के बीच रूस ने सूडान को चीन से पांच गुना ज्यादा हथियार बेचे.

सोयसा चीन का बचाव नहीं करतीं. वह कहती हैं, "हम नहीं कहते कि चीन मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं करता. हम सिर्फ इतना कह रहे हैं कि अगर हथियारों को विदेश नीति के हथकंडे के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है तो चीन अमेरिका से ज्यादा अलग नहीं है."

इस अध्ययन के बारे में अमेरिकी ज्यादा खुश नहीं हैं. वॉशिंगटन की अमेरिकन यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाली देबोराह ब्राउटिगम नॉर्वे के वैज्ञानिकों के इस अध्ययन को असंतुलित बताती हैं. ब्राउटिगम कहती हैं कि यह अध्ययन हथियारों की कीमत पर आधारित है न कि संख्या या विनाशक क्षमता पर. ब्राउटिगम के मुताबिक अमेरिकी हथियार चीन के उत्पादों के मुकाबले कहीं ज्यादा महंगे हैं इसलिए अध्ययन संतुलित नहीं है.

कुछ अन्य राजनीतिक विश्लेषक भी इस अध्ययन से पूरी तरह संतुष्ट नजर नहीं आते. लेकिन चीन ने हाल के अपने व्यवहार से यह तो कई जगह साबित किया है कि उसका मकसद कारोबार है, जैसे भी जहां भी.

रिपोर्टः क्रिस्टोफ रिकिंग/वीके

संपादनः महेश झा

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