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विज्ञान

चीन दे रहा है प्रकृति को चुनौती

चीन को दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था यूं ही नहीं कहा जा रहा है. सदियों से जिस भूमि को रेगिस्तान ने निगल लिया था, उस पर चीन एक महायोजना शुरू कर दिया है. मकसद है रेगिस्तान को उर्वरा भूमि बनाना.

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एक विशाल अभियान 'गो ग्रीन' के तहत चीन अपने देश की बंजर और रेगिस्तानी भूमि को हरा-भरा करने जुट गया है, लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि रेगिस्तान के खिलाफ लड़ाई जीतने के लिए अभी भी सैकड़ों वर्षों तक सतत प्रयासों की जरूरत पड़ेगी.
दरअसल चीन के कुल क्षेत्रफल की लगभग 27.3 प्रतिशत यानी 26 लाख वर्ग किलोमीटर भूमि बंजर तथा रेगिस्तान की श्रेणी में आती है, जो किसी भी देश के लिए एक बड़ी चिंता का सबब है. इसके अलावा लगभग तीन लाख वर्ग किलोमीटर भूमि आंशिक तौर पर बंजर मानी जाती है. इस आकार संबंधी हिसाब से चीन दुनिया का एक ऐसा देश है जहां सबसे ज्यादा बंजर और रेगिस्तानी भूमि है.


राष्ट्रीय राज्य वन व्यवस्थापन ब्यूरो के निदेशक ल्यू त्यो कहते हैं कि '5,30,000 वर्ग किलोमीटर के बंजर रेगिस्तानी क्षेत्र को हरा भरा और उपजाऊ बनाने की इस महत्वाकांक्षी योजना का वर्तमान लक्ष्य है 1717 वर्ग किलोमीटर भूमि को प्रति वर्ष उपजाऊ और हरित भूमि में परिवर्तित करना. इस हिसाब से इतनी भूमि को हरा भरा बनाने के लिए 300 वर्ष भी लग सकते हैं.

Bildgalerie Ursachen von Armut: Desertifikation

इसी विभाग के उप प्रमुख झ्यु लाइके बताते है कि 'पिछले पांच वर्षों में चीन में लगभग 12,454 वर्ग किलोमीटर भूमि को रेगिस्तान के आगोश में जाने से बचाया गया है. उत्तर पश्चिमी सिचुआन प्रांत का उदाहरण देते हुए झ्यु का कहना है कि अत्यधिक कटाई, पानी के कुप्रबन्धन और कम वर्षा अनुपात की वजह से भी रेगिस्तान धीरे धीरे और ज्यादा क्षेत्रों में फैल रहा है. ल्यु कहते है कि ग्लोबल वॉर्मिंग, असमान और तीव्र मौसमी परिवर्तनों से वनस्पति को अपूरणीय क्षति हो रही है, जिसकी वजह से सूखे क्षेत्रों में भूमि की उर्वरा शक्ति बढा़ने में काफी दिक्कतें आ रही हैं. साथ ही साथ तेजी से बढ़ती जनसंख्या और फैलती अर्थव्यवस्था भी इस सूखती जमीन की बड़ी वजह हैं.


पर इस सारी समस्याओं के बाद भी सतत प्रयासों और सही प्रबन्धन के साथ किए जा रहे कामों का बड़ा असर दिखने लगा है. इको रिहेबिलिटेशन जोन, जिसमें सालों से बंजर पड़े 'म्यु उस' रेगिस्तान तथा भीतरी मंगोलिया के स्वायता प्राप्त क्षेत्र होर्क्युन के घास के मैदानों के पारिस्थितितंत्र में काफी सुखद परिणाम देखने को मिले हैं.


दरअसल इस काम के लिए रेगिस्तान के किनारों पर वृक्षारोपण किया जाता है और उसे तीन साल तक नहरों के जाल से सींच कर सहेजा जाता है. एक बार पौधों के जड़ पकड़ लेने के बाद इस प्रकिया को आगे बढ़ाया जाता है, जिससे धीरे धीरे रेगिस्तान से भूमि को वापस लिया जाता है.
चीन ने 2020 तक वन क्षेत्रफल में 40 करोड़ हेक्टेयर के विस्तार का लक्ष्य रखा है. स्टेट काउंसिल ने दिसंबर 2010 में जारी रिपोर्ट में बताया कि चीन की सरकार प्राकृतिक जंगलों को बचाने के लिए अगले एक दशक में लगभग 220 अरब युआन (33 अरब डॉलर) खर्च करेगी.

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