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मनोरंजन

चीन की भभकी से एप्पल सहमा

अमेरिकी कंपनी एप्पल चीन की लाल आंखों के सामने सहम गई है. चीन सरकार के दबाव के चलते एप्पल ने सेंसर फ्री एप्लीकेशन को बाजार से मिटा ही दिया.

कंपनी के इस रुख की अब कड़ी आलोचना हो रही है. फ्रीवेइबो नाम के एप के जरिए चीन में लोग संवेदनशील चीजें भी पढ़ सकते थे. इस एप्लीकेशन को बनाने वाले डिजाइनर के मुताबिक पहले इसे सेंसर किया गया और फिर डिलीट कर दिया गया. चीन सरकार इंटरनेट पर कड़ा पहरा रखती है. सरकार के इस तरीके को चीन की ग्रेट फायरवॉल कहा जाता है. सरकारी दबाव की वजह से वेइबो जैसी वेबसाइटों को तल्ख कमेंट भी हटाने पड़ते हैं.

28 नवंबर को अमेरिकी कंपनी एप्पल ने चीनी एप स्टोर को यूजर्स को फ्रीवेइबो एप का इस्तेमाल करने से रोक दिया. रेडियो नीदरलैंड्स वर्ल्डवाइड के मुताबिक, चीन सरकार ने एप्पल से कहा कि ये एप्लीकेशन "स्थानीय कानूनों के खिलाफ" है. इस एप्लीकेशन को बनाने में रेडियो नीदरलैंड्स वर्ल्डवाइड का भी सहयोग था. सॉफ्टवेयर इंजीनियर लोगों को सेंसरमुक्त एप्लीकेशन मुहैया कराना चाहते थे.

रेडियो नीदरलैंड्स वर्ल्डवाइड के दावे के बाद जब समाचार एजेंसी एएफपी ने बीजिंग में इस एप्लीकेशन को खोजना शुरू किया तो जवाब मिला कि इस नाम से कोई एप उपलब्ध नहीं है.

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इंटरनेट पर कड़ी नजर रखता चीन

चीन में एप्पल के अधिकारियों ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. स्मार्टफोन बाजार के लिहाज से चीन में सबसे ज्यादा तेजी से फैलने वाला मार्केट है. माना जा रहा है कि एप्पल चीन को नाराज नहीं करना चाहता है. फ्रीवेइबो के सह संस्थापक चार्ली स्मिथ के मुताबिक "बड़े कारोबारी हितों" के चलते एप्पल ने ऐसा किया है. एप्पल की कड़ी आलोचना करते हुए उन्होंने कहा, "स्टीव जॉब्स अपनी कब्र के भीतर उलट पलट रहे होंगे, एप्पल के मामले में यह एक 'बुरा कर्म' है."

रेडियो नीदरलैंड्स वर्ल्डवाइड ने अपने बयान में कहा है, "चीन के एप स्टोर में अभिव्यक्ति की आजादी या मानवाधिकारों से जुड़े एप्स तक पहुंचना एप्पल ने नामुकिन बना दिया है."

एप्पल से पहले चीन का अमेरिकी इंटरनेट कंपनी गूगल से भी विवाद हो चुका है. 2011 में हुए सेंसरशिप विवाद के बाद गूगल ने अपने सर्च इंजन का सर्वर हॉन्ग कॉन्ग में लगा दिया.

ओएसजे/एजेए (एएफपी)

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