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विज्ञान

चीनी पारंपरिक इलाज मेडिकल की पढ़ाई में शामिल

सिंगापुर में आधुनिक और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को एक साथ पढ़ाने के लिए मेडिकल कोर्स नई पीढ़ी के लोगो को खूब आकर्षित कर रहा है. इसमें चीन की प्राचीन एक्यूपंचर पद्धति को मेडिकल साइंस के साथ पढ़ाया जाता है.

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सिंगापुर में चीन के लोगों की आबादी अच्छी खासी है और इस कारण चीन की विश्व प्रसिद्ध पारंपरिक चिकित्सा पद्धति एक्यूपंचर का भी चलन जोरों पर है. इलाज के पुराने और आधुनिक तरीकों को मेडिकल साइंस का हिस्सा बना कर शुरू किया गया कोर्स डॉक्टर बनने के इच्छुक युवाओं में खासा लोकप्रिय हो रहा है.

नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से हाल ही में यह कोर्स पूरा करने वाली छुआ हुइलिंग ने बताती हैं कि बचपन में वह वह समय काफी हैरान होती थीं जब डॉक्टर उसकी बीमार दादी की जांच "स्टेथोस्कोप" के बजाय खाने में इस्तेमाल होने वाली "चोपिस्टिक" से करता था. उस समय वह इस गूढ़ रहस्य को नहीं समझ पाती थीं. सिर्फ इतना जान पाती थीं कि दादी पर इलाज कारगर साबित होता था और वह ठीक हो जाती थीं.

छुआ इस रहस्य को अब जाकर समझ सकीं, जब उन्होंने खुद इसकी पढ़ाई की. वह बताती हैं कि इस कामयाब इलाज के तरीके की लोकप्रियता को देखते हुए "बायोमेडिकल सांइस एंड चाइनीज मेडिसिन" का कोर्स देश के तमाम मेडिकल इंस्टीट्यूट में चलाया जा रहा है. पांच साल के इस कोर्स को पूरा करने के दौरान दो साल तक चीन में एक्यूपंचर की बारीकियों को समझने के लिए खास तौर पर ट्रेनिंग दी जाती है.

यह कोर्स 21वीं सदी की अत्याधुनिक मेडिकल स्टडी को प्राचीन चिकित्सा पद्धति से जोड़ने और इसका फायदा ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पंहुचाने के लिए शुरू किया गया है. लोगों में आज भी इलाज के पारंपरिक तरीकों में प्रचलन को देखते हुए पूरब और पश्चिम के अनुभवों को साझा करने की यह पहल कारगर साबित हो रही है.

छुआ बताती है कि अब उसे समझ में आया कि चोपिस्टिक से डॉक्टर उनकी दादी की बीमारियों को पकड़ने के लिए उनके शरीर के "एक्यूप्वांइटस" का पता लगाते थे. एक्यूपंचर में शरीर के कुछ खास बिंदुओं की पहचान कर बीमारी का पता लगाया जाता है. यह कोर्स हांगकांग में पैदा हुए अमेरिकी मूल के जेम्स टेम के दिमाग की उपज था. दोहरी डिग्री देने वाले इस कोर्स में आधुनिक मेडिकल सांइस के साथ, एक्यूपंचर, पारंपरिक जड़ी बूटियों और मालिश पद्धति से किए जाने वाले इलाज यानी "तुई ना" के एक साथ इस्तेमाल और इनकी बारीकियों से छात्रों को अवगत कराया जाता है.

टेम का दावा है कि इलाज के पुराने और नए तरीकों को एक साथ इस्तेमाल करने के इस तरीके से लाइलाज बीमारियों का इलाज भी संभव है. इस लिहाज से इस कोर्स को बढ़ावा देने की हर संभव कोशिश की जानी चाहिए.

रिपोर्टः एजेंसियां/निर्मल

संपादनः ए कुमार

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