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ब्लॉग

चिंतित कारोबार हनीमून में सरकार

गाजेबाजे और शोरशराबे के साथ बीजेपी को सत्तासीन हुए नौ महीने बीत गए हैं. “अच्छे दिनों” पर सवाल उठने लगे हैं. एक बड़ा सवाल तो उस कारोबारी जगत से ही आया है जिसे प्रधानमंत्री और उनकी टीम से बहुत उम्मीदें हैं.

“अच्छे दिन आने वाले हैं” कहकर चुनाव लड़ने वाली बीजेपी ने पिछले साल मई में जब अपनी सरकार बनाई थी तो कहा गया था कि बस अच्छे दिन आ गए. लेकिन अच्छे दिनों की पोल इस तरह से खुलेगी किसी को अंदाजा नहीं था. कारोबार जगत से ही प्रतिष्ठित संस्था एसोचैम के सर्वे के मुताबिक 54 फीसदी कारोबारी पिछले छह महीनों के विकास को लेकर असंतुष्ट और निराश हैं. उनका कहना है कि ये संकेत अच्छे नहीं है. हालांकि कहा तो ये भी जाता है कि बजट से पहले इंडस्ट्री की हायतौबा करने की ये आदत सी है और इसीलिए दबाव बढ़ाने के लिए ये रिपोर्ट निकाली गई है. ताकि सरकार टैक्स और अन्य प्रावधानों को लेकर उद्योग जगत से नरमी बरतती रहे. कुछ जानकार इस सर्वे में दबाव की रणनीति भी देख रहे हैं.

थोड़ी देर के लिए मान लिया जाए कि ये दबाव की रणनीति भी है तो इसका जवाब तो आर्थिक सुधारों के प्रचंड पैरोकारों को देना ही चाहिए कि छह महीनों में गिरावट कैसे आ गई और कारोबार में बादल क्यों मंडरा रहे हैं. अपनी बेकरारी के निशान दिखाते हुए ज्यादातर उद्यमियों का मानना है कि पिछले छह महीनों में वास्तविक धरातल पर कुछ नहीं बदला है. कई कारोबारी चिंतित है कि इस तिमाही में भी निवेश योजनाओं में कोई बदलाव आना मुश्किल ही है. उद्योग जगत को निर्यात बाजार से भी कोई खास उम्मीद नहीं है. उसके भी फीके ही रहने के आसार हैं.

बीजेपी सरकार को चीजें वहां से आगे ले जानी चाहिए जहां पिछली सरकार ने छोड़ी थीं. ये कहने से काम नहीं चलेगा कि यूपीए का दौर अंधेरे का दौर था. अगर वो अंधेरा था तो आपके नौ महीने भी सिर्फ नकली उजाला दिखा रहे हैं. वैसे सरकारी गैर सरकारी और अर्थ जगत के आंकड़ों को देखें तो विदेशी व्यापार, निवेश, तेज वृद्धि, ऊंची बचत और पूंजी प्रवाह और बुनियादी ढांचे के विकास के मामलों में यूपीए का रिकॉर्ड बुरा नहीं रहा था. कल्याण योजनाओं में निवेश के बावजूद सरकार ने आर्थिक हालत को डांवाडोल होने से बचाए रखा था. विश्व अर्थव्यवस्था के सापेक्ष भारतीय अर्थव्यवस्था कितनी तेज या धीमी वृद्धि कर रही है, इस पर सरकार का प्रदर्शन देखा जाता है. तो इस मामले में यूपीए का कार्यकाल आकर्षक ही माना गया है.

मुद्रास्फीति के मामले में यूपीए का रिकार्ड अच्छा नहीं माना जाता. खाद्यान्न की कीमतें बढ़ती रहीं, दूसरे आर्थिक असमानता भी समाज में तेजी से बढ़ी है. अमीर गरीब के बीच खाई इस दरम्यान और चौड़ी हो गई. क्या बीजेपी सरकार इस खाई को कम करने की दिशा में कुछ कर पाएगी? क्या वो बुनियादी ढांचे का विकास कुछ इस तरह कर पाएगी कि निवेश योजनाओं में लूटपाट की अदृश्य हिंसकता कम हो. ये सब बातें कारोबारी माहौल को बेहतर बना सकती हैं. लेकिन यूपीए परसेप्शन गेम में आखिरकार मात खा गया क्योंकि वहां दूरदर्शी नेतृत्व का अभाव था.

“अच्छे दिनों” के अट्टहास के बीच एक लिहाज से देखा जाए तो ये सर्वे रिपोर्ट मोदी सरकार के लिए वेकअप कॉल की तरह है. हनीमून की अवधि को लंबा नहीं खींचा जा सकता. ऐक्शन में भी सरकार को दिखना चाहिए. लेकिन सरकार से इतर दुर्योग से ऐक्शन अगर दिख रहा है तो हिंदूवादी आग्रहों के पुरजोर प्रचार में. उद्योग जगत अपने लिए बेहतरी की उम्मीद कर रहा है लेकिन समाज में शांति और बेहतरी के उपायों पर पानी फेरा जा रहा है.

ऐसे में दुश्चिंता स्वाभाविक है. और एक स्वस्थ कारोबार एक स्वस्थ समाज में ही पनप सकता है इसलिए ये भी जरूरी है कि अपनी नीतियों को विकास केंद्रित करने के साथ साथ मौजूदा सरकार, सामाजिक सहिष्णुता और शांति के लिए भी पहल करे. वो सिर्फ आवभगत और दावत और कपड़े सूट बदलने में ही व्यस्त न रहे, बाहर निकलकर समाज और उद्योग की निराशा में भी झांके. उम्मीद है सरकार के आर्थिक और निवेश सलाहकार ये बात उसे ठीक से बता पा रहे होंगे.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

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