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विज्ञान

चांद जितना चमक सकता है 'आइसन'

28 नवंबर को धूमकेतु आइसन का सूर्य के बहुत नजदीक होना खतरनाक हो सकता है, लेकिन यह वैज्ञानिकों और देखने वालों के लिए दिलचस्प होगा.

धूमकेतु आइसन 28 नवंबर को सूर्य से निकटतम दूरी पर होगा. इससे पहले कभी वैज्ञानिकों को ऐसा देखने को नहीं मिला है. अनुमान है कि आइसन इस दिन सूर्य से करीब 12 लाख किलोमीटर की दूरी पर होगा. यूरोपीय स्पेस एजेंसी के वैज्ञानिक मिषाएल खान ने बताया, "यह दूरी सूर्य के व्यास से आधी है, यानि यह काफी करीब है."

नष्ट होने की संभावना

जहां दूसरे धूमकेतु आकार में छाटे, लगभग 10 मीटर व्यास वाले हैं. उनके मुकाबले आइसन काफी बड़ा है. यह करीब एक किलोमीटर चौड़ा है. जब धूमकेतु सूर्य के बहुत पास आ जाते हैं तो टूट जाते हैं. यह खतरा आइसन को भी है.

1965 में आइसन जितने आकार का ही एक अन्य धूमकेतु इकेया सेकी भी सूर्य के बहुत करीब आ गया था. तब वह टूटने से बच गया था. उसके बड़े आकार ने सूर्य के तापमान से उसके आंतरिक हिस्से को टूटने से बचा लिया.

जर्मनी में सोलर सिस्टम रिसर्च से जुड़े माक्स प्लांक इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर वेर्नर कुर्ट ने बताया कि अगर आइसन टूटने से बच भी जाता है तो भी वह सूर्य की सतह पर 2000 डिग्री सेल्सियस के तापमान को झेलेगा. अंतरिक्ष विज्ञानियों को उम्मीद है कि आइसन इससे कुशलता पूर्वक गुजर जाएगा.

सदी का धूमकेतु

आइसन की खोज 2012 में खगोलशास्त्री विटाली नेसकी और आर्टयोम नोविचोनोक ने की थी. इंटरनेशनल साइंटिफिक ऑप्टिकल नेटवर्क (आईएसओएन) के टेलिस्कोप से इसकी खोज होने के कारण इसका नाम आइसन रखा गया. इसे सदी का धूमकेतु भी कहा जाता है. इसकी उत्पत्ति प्रकाश वर्ष सी/2012 से होने की संभावना मानी जाती है. आइसन जैसे असामान्य धूमकेतु आमतौर पर पृथ्वी से एक बार ही दिखाई देते हैं, जबकि हैली के धूमकेतु यानि साधारण धूमकेतु करीब 75 साल में एक बार दिखाई दे जाते हैं.

आइसन एक कक्ष में चक्कर नहीं काट रहा. खान ने बताया कि इसका मतलब है कि आइसन पृथ्वी के वायुमंडल में दोबारा नहीं लौटेगा. वह अंतरिक्ष के असीम विस्तार में आगे निकल जाएगा और कभी वापस नहीं आएगा.

इसका मतलब है कि वैज्ञानिकों के पास बस यही एक मौका है इसके बारे में जितनी हो सके जानकारी इकट्ठा कर लेनी चाहिए. खान ने बताया, "हमारा रोसेटा अंतरिक्ष यान धूमकेतु के पास जाएगा और उसे करीब से देखेगा. इसके साथ एक छोटा लैंडिंग क्राफ्ट भी होगा दो धूमकेतु की सतह पर उतरेगा."

Hubble Aufnahme vom Kommet ISON 21.10.2013

अगर आइसन नष्ट नहीं हुआ तो 30 दिन तक इसे चमकता हुआ देखा जा सकेगा.

इसकी मदद से वैज्ञानिकों को धूमकेतु के जीवनचक्र और सौर मंडल के बारे में और जानकारी इकट्ठा करने में मदद मिलेगी. खान मानते हैं कि इस बारे में अभी तक हम जितना जानते हैं वह बहुत कम है.

कुर्ट कहते हैं अभी तक वैज्ञानिक इतना ही जानते हैं कि धूमकेतुओं का निर्माण 4.6 अरब साल पहले सौर मंडल के निर्माण के दौरान बचे खुचे तत्वों से मिलकर हुआ. क्योंकि इनका बाहरी वातावरण बेहद ठंडा है इसलिए गैसों के ये पिणड काफी सालों तक सुरक्षित रहते हैं. इनसे वैज्ञानिकों को यह पता करने में मदद मिलती है बिग बैंग के समय परिस्थितियां कैसी थीं.

इंतजार के पल

आइसन सूर्य के पास से 50 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से गुजरेगा. लेकिन इसका क्या असर होगा इस बारे में लोग अनुमान ही लगा रहे हैं, कोई सही सही नहीं कह सकता.

नासा, यूरोपीय स्पेस एजेंसी और हबल हेरिटेज टीम के अनुसार सूर्य के पास से गुजर जाने के 30 दिन बाद तक आइसन का कुछ हिस्सा पृथ्वी से देखा जा सकेगा.

कुर्ट ने बताया, "जैसे जैसे यह सूर्य के करीब आएगा इसकी चमक बढ़ती जाएगी. धूमकेतु में बहुत सारे परिवर्तन भी होंगे, इसका बहुत सारा अंश नष्ट भी हो जाएगा, काफी सारा पानी जल जाएगा. लेकिन कोई ठीक से नहीं कह सकता कि क्या होगा क्योंकि यह नया धूमकेतु है और हमारे पास इस तरह के नए धूमकेतुओं के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है. खासकर वे जो सूर्य के इतने नजदीक जाते हों." आइसन सूर्य के करीब पहुंच कर जल जाएगा, या गुरुत्वीय बल से सूर्य इसे अपने अंदर खींच लेगा, यह जानने के लिए फिलहाल वैज्ञानिक इंतजार कर रहे हैं.

कितना चमकेगा आइसन

सूर्य के करीब आने पर इसकी चमक बढ़ना तो तय है लेकिन यह कितना चमकेगा अभी कहा नहीं जा सकता. कुर्ट ने बताया, "ऐसे भी अनुमान हैं कि इसकी चमक शुक्र (ग्रह) से भी ज्यादा होगी. कुछ लोगों का यह भी अनुमान है कि यह चंद्रमा जितना चमकेगा. ऐसे कयास भी लगाए जा रहे हैं कि यह पूरी तरह विघटित हो जाए और सामान्य आंखों से देखा भी ना जा सके."

खान कहते हैं जो भी हो लेकिन यह एक बड़ा नजारा होगा. उन्होंने कहा, "सूर्य से टकराने के बाद इसे देखना इतना शानदार नहीं होगा, लेकिन अगर यह नष्ट होने से बच जाता है तो दिसंबर के पहले हफ्ते तक हम इसे देख सकेंगे."

रिपोर्ट: डर्क लोरेंजेन/ एसएफ

संपादन: एन रंजन

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