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दुनिया

चला गया पक्के इरादों वाला राजनयिक

बोस्नियाई युद्ध को खत्म करने वाले डेटन शांति समझौते को तैयार करने में अहम भूमिका निभाने वाले रिचर्ड होलब्रुक एक राजनयिक होने के साथ साथ वित्तीय क्षेत्र में भी बड़े पदों पर काम कर चुके थे. अफगानिस्तान आखिरी जिम्मेदारी रही

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बस रह गईं यादें

पक्के इरादों और मजबूत संकल्प को अपने शांत से दिखने वाले व्यक्तित्व में सहेज कर रखने वाले होलब्रुक का नाम द बुलडोजर भी रखा गया. उनके बारे में कहा जाता है कि एक दूसरे को फूटी आंख भी न सुहाने वाले नेताओं को वह बातचीत की मेज तक लाने में कई बार कामयाब रहे. ग्रीस और तुर्की के बीच भी जलक्षेत्र विवाद के चलते संभावित सैन्य संघर्ष टालने में उन्होंने भूमिका निभाई.

रिचर्ड होलब्रुक का जन्म न्यूयॉर्क में 1941 में हुआ. उन्होंने अमेरिका की ब्राउन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की और लेखिका केटी मार्टन से शादी रचाई. होलब्रुक के राजनयिक जीवन की शुरुआत वियतनाम से हुई और उन्होंने एशिया के लिए अमेरिकी विदेश उप विदेश मंत्री की जिम्मेदारी निभाई. होलब्रुक जर्मनी में अमेरिकी राजदूत भी रहे. 1994-96 में वह यूरोपीय और कनाडा के मामलों के विदेश उप मंत्री थे और उसी दौरान शांति प्रतिनिधिमंडल लेकर होलब्रुक बोस्निया गए जो गृह युद्ध झेल रहा था.

होलब्रुक मानते थे कि गलत कामों को अंजाम देने वाले लोगों के साथ बातचीत करने से उन्हें परहेज नहीं हैं और न ही वह इसे नैतिक रूप से बुरा मानते हैं. 1999 में होलब्रुक ने कहा, "अगर आप लोगों की जान बचा सकते हैं तो इससे उन लोगों का अपमान नहीं होता जिनकी जान इसी कोशिश में चली गई." बोस्निया में युद्ध को समाप्त करने वाले डेटन शांति समझौते के लिए उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया. हालांकि 1999 में वह सर्बिया के राष्ट्रपति स्लोबोदान मिलोसेविच को कोसोवो से सर्ब सैनिक हटाने के लिए नहीं मना सके.

अपनी बौद्धिक क्षमता और समझ के लिए प्रशंसा पाने वाले होलब्रुक के बारे में कहा जाता है कि उनका काम करने का तरीका टकराव वाला था. 1997 में उनके अमेरिकी विदेश मंत्री बनने की संभावना थी लेकिन फिर यह जिम्मेदारी मैडलीन अलब्राइट को दे दी गई. एक साल बाद उन्हें संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत नियुक्त किया गया.

2004 में राष्ट्रपति चुनाव में वह सीनेटर जॉन कैरी के लिए प्रचार अभियान का हिस्सा रहे और 2008 में वह डेमोक्रेट पार्टी में हिलेरी क्लिंटन की राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए दावेदारी का समर्थन कर रहे थे. अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद बराक ओबामा ने उन्हें पाकिस्तान और अफगानिस्तान के लिए विशेष अमेरिकी दूत नियुक्त किया. तालिबान और अल कायदा आतंकवादियों के खिलाफ लड़ाई में उन्होंने पाकिस्तान और अफगानिस्तान को साथ लेकर चलने का प्रयास किया. 69 साल की आयु में उनका निधन हो गया.

रिपोर्ट: एजेंसियां/ एस गौड़

संपादन: ए कुमार

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