1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

विज्ञान

चमगादड़ों को समर्पित है 2011

दुनिया भर में चमगादड़ों की संख्या लगातार घट रही है. इसीलिए संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2011 को चमगादड़ों को समर्पित किया है. जानकारों का कहना है कि अकसर हॉरर फिल्मों में दिखने वाले चमगादड़ों के डरने की जरूरत नहीं है.

default

चमगादड़ों से बहुत से लोग डरते हैं. इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि रात में उड़ने वाले चमगादड़ों के बारे में आम लोगों को बहुत कम जानकारी होती है. दिलचस्प बात यह है कि वे उड़ने वाले इकलौते स्तनपायी जीव हैं. चमगादड़ों की 1,200 प्रजातियां हैं और वे जैव पारिस्थितिकी यानी इकोसिस्टम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. पिछले कुछ दशकों में दुनियाभर में उनकी संख्या तेजी से घटी है. चमगादड़ों की बहुत सी प्रजातियां तो विलुप्त होने के कागार पर हैं. इसलिए संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2011 को चमगादड़ों को समर्पित किया है और पूरी दुनिया में उन्हें बचाने के लिए कदम उठाए जाएंगे. इसके लिए विशेष प्रॉजेक्टों के जरिए लोगों को प्रशिक्षण दिया जाएगा.

चमगादड़, एक आकर्षक जीव

किसी गुफा में एक अजीब तरह की चू-चूं और तेज दुर्गंध. अंधेरे में जीने वाले चमगादड़ों को बहुत से लोग हॉरर फिल्मों या डरावनी कहानियों के साथ जोड़ते हैं. लेकिन यह गलत है. यह मानना है यूरोपीय चमगादड़ों को बचाने के लिए बनाई गई विशेष संस्था के अध्यक्ष आंद्रेआस श्ट्राईट का.

Epomophorus gambianas Flash-Galerie

वह कहते हैं, "जो भी बातें चमगादड़ों के बारे में कही जाती हैं, वे सब पूर्वाग्रह से प्रेरित हैं. इसलिए इस मुहिम का मकसद है कि लोगों को बताया जाए कि यह सब बातें गलत हैं और चमगादड़ बहुत ही आकर्षक जीव है. उनके अंदर बहुत सारे गुण और क्षमताएं हैं जिनके बारे में आम आदमी को जानकारी ही नहीं है."

यूरोपीय चमगादड़ों को बचाने के लिए हुई संधि को 2011 में 20 साल पूरे हो रहे हैं. चमगादड़ उच्च आवृत्ति की ध्वनियों के जरिए उड़ते हैं जो अकसर इंसानों को नहीं सुनाई देती हैं. साथ ही वे सिर को उल्टा लटका करके सोते हैं. यूरोप में बहुत सारे प्रयासों की वजह से चमगादड़ों की संख्या स्थिर बनी हुई है. लेकिन दुनिया के दूसरे इलाकों में ऐसा नहीं है. इसलिए संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें गोरिल्ला और डोल्फिन की तरह पूरा साल समर्पित किया है.

इकोसिस्टम की जरूरत

आंद्रेआस श्ट्राईट बताते हैं कि चमगादड़ों की इकोसिस्टम में बहुत बड़ी भूमिका है. वह कहते हैं, "देखा जाए तो ज्यादातर पंछी रात को सोते हैं. जो जानवर रात में शिकार पर जाते हैं वे अधिकतर बड़े जीवों को खाते हैं. उदाहरण के लिए उल्लू चूहे खाता है. लेकिन दूसरी तरफ बहुत सारे ऐसे कीड़े मकौड़े हैं जो रात को सक्रिय होते हैं. इनमें ऐसी मक्खियां भी हैं जो फसल को नुकसान पहुंचाती हैं. प्राकृतिक रूप से इन कीड़े मकौड़ों पर सिर्फ चमगादडों के जरिए नियंत्रण रखा जा सकता है. एक चमगादड़ 5-6 हजार मक्खियों को खा सकता है."

चमगादड़ आर्थिक लिहाज से भी बहुत ही जरूरी हैं और खासकर किसानों को उनकी रक्षा करना चाहिए. आंद्रेआस श्ट्राईट बताते हैं, "उष्ण कटिबंधीय इलाकों में बहुत

Rousettus aegyptiacus Nilflughund Flash-Galerie

से फल खाने वाले चमगादड़ मिलते हैं. परागणों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है और उनके जरिए ही बीज फैलाए जाते हैं. कुछ ऐसे पौधे भी होते हैं जो अपने रंग और सुगंध से सिर्फ चमगादड़ों को आकर्षित करते हैं और यह सिर्फ वनों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि खेतों में पैदा होने वाली फसलों के लिए भी यह बात सही है."

कमी की वजह

बहुत सारे ऐसे फल हैं जिनके फलने फूलने के लिए चमगादडों का होना बहुत जरूरी है. जैसे आम, अंजीर, थाइलैंड और फिलीपींस में खाए जाने वाला दुरियान या अवोकाडो. चमगादड़ों की इतनी उपयोगिता के बावजूद वे दुनिया के कई इलाकों में विलुप्त होने के कागार पर हैं. इसके बारे में आंद्रेआस श्ट्राईट बताते हैं, "दुनिया के कई हिस्सों में चमगादड़ों की घटती संख्या की वजह की उनके माहौल में इंसानी हस्तक्षेप है. वन भी नष्ट होते जा रहे हैं. साथ ही फसल को बचाने के लिए कीटनाशक दवाइयों का इस्तेमाल किया जाता है. इससे चमगादड़ों को खाना नहीं मिलता है और यह जहरीले कीटनाशक उन्हें मार भी सकते हैं."

कई अफ्रीकी और एशियाई देशों में चमगादड़ों को खाया भी जाता है. चमगादड़ों की घटती संख्या के बावजूद उनका शिकार जारी है. कई जगह चमगादड़ों को यह कह भी मारा जाता है कि उनसे रैबीस जैसी बीमारियां फैलती हैं. लेकिन यह सच नहीं है. अगर उनसे कोई बीमारी होती भी है तो यह बात समझनी चाहिए कि आम तौर पर मनुष्य से उनका संपर्क नहीं होता है. वैसे भी संक्रमित चमगादड़ मणुष्य पर हमला नहीं करते. 2011 में दुनियाभर में चमगादड़ों की रक्षा के लिए चिड़ियाघरों और स्कूलों में लोगों को जानकारी दी जाएगी. उदाहरण के लिए कई इलाकों में गुफाओं में जाकर भी उनके बारे में शोध किया जाएगा.

रिपोर्टः प्रिया एसेलबोर्न

संपादनः ए कुमार

DW.COM

WWW-Links