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दुनिया

चमकते जूते से चमकेगा राज्य!

पश्चिम बंगाल सरकार को शायद लगने लगा है कि चमकते जूते चप्पलों से ही सरकार और राज्य की किस्मत चमक सकती है और इसी से कर्मचारियों की कार्यसंस्कृति में बदलाव आ सकता है.

राजधानी कोलकाता स्थित राज्य सचिवालय राइटर्स बिल्डिंग के 100 साल से भी पुराने इतिहास में पहली बार सरकार ने हाल में वहां जूते चप्पलों पर पॉलिश की दो मशीनें लगाई हैं.

कार्य संस्कृति का अभाव

पश्चिम बंगाल में 2002 में सत्ता में आने के बाद उस वक्त के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने सरकारी कर्मचारियों की कार्य संस्कृति सुधारने के लिए डू इट नाऊ का नारा दिया. लेकिन उनका वह नारा कागजों तक ही सिमट कर रह गया. राज्य में दो साल पहले ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बावजूद वह संस्कृति जरा भी नहीं बदली है. बदलाव की लहर पर सवार होकर सत्ता में आई सरकार ने सोचा कि कर्मचारियों के जूतों की चमक से शायद सरकार की किस्मत भी चमक सकती है.

इसलिए राज्य सचिवालय में जूते चप्पल पॉलिश करने की दो मशीनें लगाई गई हैं. ऐसी हर मशीन की कीमत 15,000 रुपये हैं. इससे कर्मचारियों में बेहद खुशी है. राज्य सचिचावलय में काम करने वाले ज्यादातर कर्मचारी दूर दराज के इलाकों से लोकल ट्रेनों और बसों में सफर कर अपने दफ्तर पहुंचते हैं. ऐसे में उनके जूतों की चमक खत्म होना लाजिमी है. कहा जाता है कि "किसी आदमी की हैसियत जानना हो तो उसके कपड़े नहीं बल्कि जूते देखने चाहिए."

जूते चमकाने के लिए भीड़

अब सचिवालय में यह मशीनें लगने के बाद कर्मचारियों में अपने जूते चमकाने की होड़ लग गई है. पुलिसवालों से लेकर सरकारी कर्मचारी तक अपने जूते चप्पल चमकाने के लिए कतार में खड़े हो रहे हैं. कर्मचारी ही नहीं, सचिवलाय पहुंचने वाले लोग भी अपने फटे पुराने जूते चप्पलों में चमक लाने के लिए इन मशीनों के इस्तेमाल से पीछे नहीं हट रहे हैं. वित्त विभाग में काम करने वाले मनोज गांगुली कहते हैं, "सरकार ने यह बढ़िया काम किया है. घर से दफ्तर और वापसी की आपाधापी में ज्यादातर कर्मचारियों को जूते चप्पल चमकाने का मौका ही नहीं मिलता था. अब दफ्तर पहुंचने से पहले हम लोग पहले अपने जूते चमकाते हैं."

पहला मौका

वैसे दिल्ली में केंद्रीय सरकार के विभिन्न दफ्तरों में ऐसी मशीनें सामान्य हैं. लेकिन यह पहला मौका है जब बंगाल में इन मशीनों को लगाया गया है. दिल्ली स्थित बंग भवन में पहले से ऐसी मशीन लगी है. लेकिन मजेदार बात यह है कि बंग भवन में मशीन लगाने का फैसला तब किया गया, जब इस बात का खुलासा हुआ कि वहां ठहरने वाले लोग अपने जूते चप्पलों को चमकाने के लिए कमरे में बिछी चादरों का इस्तेमाल करते हैं, नतीजतन वहां हर महीने नई चादरें खरीदनी पड़ती थीं.

अन मशीनों को लगाने वाले सार्वजनिक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) का कहना है कि सरकार ने विभिन्न मंत्रालयों में कार्य संस्कृति को बढ़ावा देने और सरकार की छवि को चमकाने के लिए ही जूते चप्पल चमकाने वाली मशीनें लगाई हैं. राज्य सचिवालय में ऐसी 10 और मशीनें लगाई जानी हैं. वैसे सरकारी अधिकारियों का एक वर्ग मानता है कि सरकार की वित्तीय स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस अतिरिक्त खर्च की कोई जरूरत नहीं.

राइटर्स बिल्डिंग में हाल में लगी इन मशीनों की सूचना मिलते ही तमाम कर्मचारी वहां पहुंचने लगे और इसी पर चर्चा होने लगी. पहले कुछ दिन तो मुफ्त जूते चप्पल चमकाने की हवस इतनी भारी पड़ी कि मशीनों के सामने कर्मचारियों की लंबी कतार लगी रही.

राइटर्स बिल्डिंग में 8,000 कर्मचारी काम करते हैं. उनके लिए वहां कुल 12 ऐसी मशीनें लगाई जाएंगी. लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या महज जूते चप्पल चमकने से ही कर्मचारियों की कार्यसंस्कृति चमकेगी. वित्त विभाग के एक अधिकारी कहते हैं कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ही इन मशीनों को लगाने पर जोर दिया था. वह चाहती थीं कि कर्मचारी जूतों की पॉलिश के बहाने अपना काम छोड़ कर दफ्तर से बाहर नहीं जाएं. इसलिए आर्थिक तंगी के बावजूद इनको लगाने का फैसला किया गया गया.

रिपोर्टः प्रभाकर, कोलकाता

संपादनः ए जमाल

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