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दुनिया

चपटी धरती नहीं चाहते ओबामा

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने तरफ से खाका तैयार किया है. उनका कहना है कि अगर नई बंदिशें नहीं लगाई गईं, तो धरती चिपटी हो सकती है.

ओबामा की महत्वाकांक्षी योजना के मुताबिक अमेरिका को 2005 के स्तर के हिसाब से कार्बन गैसों के निकलने में 17 फीसदी की कमी लानी होगी और यह काम 2020 से पहले कर लेना होगा. कोपेनहेगन में जब 2009 में जलवायु परिवर्तन पर सम्मेलन हुआ था, तो ओबामा ने यह बात रखी थी लेकिन उस सम्मेलन का कोई नतीजा नहीं निकला था.

राष्ट्रपति का कहना है कि सरकार ने अपनी तरफ से कोई कार्रवाई नहीं की है और अमेरिका के लोगों को इसकी कीमत अदा करनी पड़ रही है. जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी में दोपहर की गर्मी में बिना जैकेट और लंबी बाजू वाली शर्ट को बांह तक मोड़े हुए ओबामा ने मौसमी बदलाव पर अपनी तकरीर दी.

बैठे नहीं रह सकते

उन्होंने कहा, "एक राष्ट्रपति, एक पिता और एक अमेरिकी के लिहाज से मैं कहना चाहता हूं कि हमें काम करने की जरूरत है." उन्होंने कहा कि वह उन लोगों के प्रति धीरज नहीं रख सकते, जो जलवायु परिवर्तन की बात से इनकार करते हैं और ऐसे कई लोग तो अमेरिकी कांग्रेस में भी हैं, "हमारे पास फ्लैट अर्थ (चपटी धरती) सोसाइटी की बैठक के लिए समय नहीं है. अगर आप अपना सिर रेत में घुसा लें तो शायद खुद को सुरक्षित महसूस कर सकते हैं लेकिन तूफान फिर भी आएगा."

पाइपलाइन पर भी विवाद

अमेरिकी राष्ट्रपति ने संवेदनशील एक्सएल पाइपलाइन के मुद्दे को भी छेड़ दिया. इस प्रस्ताव में कनाडा की रेत से तेल को अमेरिकी तटों तक लाने की योजना है. उन्होंने चेतावनी दी कि यह देखने की चीज होगी कि क्या यह वाकई अमेरिका के हित में है और अगर इससे ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ने का खतरा होगा, तो इसे पूरा नहीं किया जाएगा, "हमारा राष्ट्रीय हित तभी सधेगा, जब यह प्रोजेक्ट कार्बन प्रदूषण को बढ़ावा न दे."

समझा जा रहा था कि राष्ट्रपति लंबे समय से लटके पड़े प्रोजेक्ट को हरी झंडी दिखा देंगे. विदेश विभाग ने पहले ही कहा है कि इससे पर्यावरण पर खास फर्क नहीं पड़ने वाला है. कनाडा ने भी उम्मीद जताई है कि यह काम हो जाएगा. हालांकि पर्यावरण से जुड़े लोगों का कहना है कि इससे धरती के "सबसे गंदे तेल" को निकाले जाने की योजना है.

योजना की तीन बातें

ओबामा की योजना मुख्य रूप से तीन बातों पर केंद्रित है, अमेरिका में कार्बन प्रदूषण कम करना, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए काम करना.

इसका विरोध करने वालों का तर्क है कि ओबामा का यह प्लान अगर नाकाम हुआ, तो वही हाल होगा, जो कोयले से चलने वाले प्रोजेक्टों के बंद होने से हुआ. इसके बाद बिजली की दरों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई. हालांकि अधिकारियों का कहना है कि इस योजना से दरअसल बिजली कम खर्च होगी और इससे दरें घट ही सकती हैं, बढ़ेंगी नहीं.

राष्ट्रपति इस मिशन के लिए अपने विशेष कार्यकारी शक्ति का इस्तेमाल करेंगे क्योंकि अमेरिकी संसद आम तौर पर इस पर खामोश बैठी है. ओबामा का यह भी लक्ष्य है कि 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में तीन अरब मीट्रिक टन की कमी लाई जाए. यह अमेरिका के मौजूदा उत्सर्जन का आधा है. अमेरिका दुनिया में सबसे ज्यादा जहरीली गैस छोड़ने वाला देश है.

एजेए/एमजे (एएफपी, एपी)

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