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ब्लॉग

चक्की के दो पाटों के बीच पिसता बंगाल

'अच्छे दिन' लौटाने के नारे के साथ केंद्र की सत्ता पर काबिज होने वाली नरेंद्र मोदी सरकार की वजह से कम से कम पश्चिम बंगाल में तो अब तक इसकी आहट नहीं मिल सकी है.

उल्टे नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से राजनीति से लेकर उद्योग तक हर मोर्चे पर राज्य और केंद्र सरकार के मतभेद सतह पर आ चुके हैं. राज्य में अपने पांव जमाने का प्रयास कर रही बीजेपी और सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस जहां बर्चस्व की लड़ाई में व्यस्त हैं, वहीं बीमा समेत विभिन्न क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने और भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन जैसे मुद्दों पर भी ममता बनर्जी सरकार ने केंद्र के खिलाफ तलवार खींच रखी है. करोड़ों के शारदा घोटाले में सीबीआई की जांच के दौरान पार्टी के असरदार नेताओं की गिरफ्तारी ने भी इन दोनों दलों के संबंधों में खाई बढ़ाई है. राजनीतिक दलों के बीच बर्चस्व की तेज होती लड़ाई ने खास कर ग्रामीण इलाकों में विकास और जीवन की रफ्तार सुस्त कर दी है.

कोलकाता में पिछले दिनों हुए वैश्विक निवेशक सम्मेलन के दौरान ममता बनर्जी ने पहली बार केंद्र के दो मंत्रियों, वित्त मंत्री अरुण जेटली और भूतल परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के साथ पहली बार मंच साझा किया. लेकिन इस सम्मेलन पर भी केंद्र-राज्य संबंधों की खटास की छाप साफ नजर आई. जेटली और ममता ने इसे छिपाने का कोई प्रयास भी नहीं किया. जेटली ने जहां ममता को राज्य में निवेश के अनुकूल माहौल बनाने की नसीहत दी तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने भाषण में माना कि केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के साथ उनके विभिन्न मुद्दों पर मतभेद हैं. लेकिन उन्होंने निवेशकों को भरोसा दिलाया कि यह राजनीतिक मतभेद विकास की राह में आड़े नहीं आएगा.

राजनीतिक दावे

वित्त मंत्री अमित मित्र ने तृणमूल कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद राज्य में 83 हजार करोड़ के निवेश का दावा किया है. लेकिन आंकड़े उनके इस दावे की पोल खोलते हैं. इस दौरान जेएसडब्ल्यू स्टील की सालबनी परियोजना समेत कई परियोजनाएं बंद हुई हैं. वर्ष 2012 में राज्य में महज 312 करोड़ की परियोजनाओं को अमली जामा पहनाया जा सका था. बीते साल हिंद मोटर्स और शालीमार पेंट्स जैसी पुरानी कंपनियों में ताले बंद हो गए. हल्दिया पेट्रोकेम में भी काम शुरू नहीं हो सका. केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 2012-13 में राज्य में विकासदर 5.48 प्रतिशत रही तो वित्त मंत्री ने 2013-14 के दौरान इसके 8.78 प्रतिशत होने का दावा किया है.

केंद्र और राज्य के बीच वैसे तो कई मुद्दों पर मतभेद हैं, लेकिन विवाद का ताजा मुद्दा भूमि अधिग्रहण कानून में हुए संशोधन का है. राज्य सरकार ने इसे काला कानून करार देते हुए केंद्र के खिलाफ आंदोलन छेड़ रखा है. इस संशोधन में कुछ परियोजनाओं के लिए सरकारों को किसानों की जमीन के अधिग्रहण का अधिकार दिया गया है. ममता सरकार ने पहले ही साफ कर दिया है कि सरकार उद्योगों के लिए खेती की जमीन का जबरन अधिग्रहण नहीं करेगी. उनकी दलील है कि उद्योगों के साथ-साथ खेती के हितों का ध्यान रखना भी जरूरी है.

उद्योग जगत का संदेह

किसी भी राज्य के विकास में निर्माण उद्योग की भूमिका अहम है. लेकिन ममता के सिर पर लगा सिंगुर का कलंक अब तक नहीं धुल सका है. ममता के आंदोलन के चलते ही टाटा ने अपनी लखटकिया कार परियोजना सिंगुर से हटा ली थी. उद्योग जगत का कहना है कि सरकार जब तक अपनी जमीन संबंधी नीति नहीं बदलेगी तब तक राज्य में कोई बड़ा निवेश होना मुश्किल है.

ममता मई 2011 में सत्ता में आने के बाद से ही राज्य के लिए एक विशेष पैकेज की मांग करती रही हैं. लेकिन न तो पहले की यूपीए सरकार ने इस मांग को कोई तवज्जो दी और न ही अब एनडीए सरकार ने इस पर कोई ध्यान दिया है. ममता की दलील है कि पूर्व वाममोर्चा सरकार ने जो भारी कर्ज लिया था उसके ब्याज के मद में ही सरकार को हर साल 28 हजार करोड़ रुपए की भारी रकम चुकानी पड़ती है. ऐसे में विकास के लिए धन ही नहीं बचता. वह इस कर्ज की अदायगी को कम से कम तीन साल तक स्थगित रखने की भी मांग उठाती रही हैं.

शारदा घोटाले में पार्टी के तमाम असरदार नेताओं की गिरफ्तारी ने भी ममता और उनकी पार्टी की त्यौरियां चढ़ा दी हैं. उसने सीबीआई पर भाजपा की इकाई के तौर पर काम करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि केंद्र सरकार इस जांच एजेंसी का इस्तेमाल राजनीतिक बदला चुकाने के मकसद से कर रही है. फिलहाल बंगाल केंद्र और राज्य के आपसी मतभेदों की चक्की में पिसने को अभिशप्त है. 'अच्छे दिन' आएं या नहीं, कभी उद्योगों के लिहाज से अव्वल रहा यह राज्य धीरे-धीरे ही सही, लगातार बुरे दिनों की ओर ही बढ़ रहा है.

ब्लॉग: प्रभाकर

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