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दुनिया

चक्करों से बचाने वाला ही चक्कर में

भारत में लाइसेंस राज के जमाने से चल आ रहे परमिट सिस्टम की दिक्कतों को दूर करने के लिए उठा सबसे महत्वाकांक्षी कदम खुद उन्हीं मुश्किलों में फंस गया है जिनसे मुक्ति दिलाने की उस पर जिम्मेदारी है.

अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के लिए निर्माण से जुड़ी बड़ी परियोजनाओं को जल्दी से मंजूरी देने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले एक पैनल का प्रस्ताव दिया गया. अब यह प्रस्ताव वित्त और पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारों की खींचतान में फंसा है और बिना सहमति के इसे आगे बढ़ाया नहीं जा सकता.

इस विवाद ने निवेशकों और कारोबारियों के मन में चिंता बढ़ा दी है. उन्हें लग रहा है कि प्रधानमंत्री के सुधारों का कार्यक्रम सरकार और राजनीति की मुश्किलों में फंस कर रहा जाएगा. भारत के वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने पिछले महीने नेशनल इन्वेस्टमेंट बोर्ड बनाने का प्रस्ताव रखा था और उम्मीद की थी कि कैबिनेट इसे जितनी जल्दी हो सके, मंजूर कर देगा. कैबिनेट की साप्ताहिक बैठकों में इस बोर्ड के एजेंडे पर सहमति ही नहीं बन पा रही है.

निवेशकों और अर्थशास्त्रियों का कहना है कि एनआईबी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए क्योंकि केवल सड़क, बिजली, कोयला और खनन क्षेत्र के ही कम से कम दो लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के प्रोजेक्ट अटके पड़े हैं. पिछले हफ्ते विश्व आर्थिक मंच की बैठक में भी कारोबारियों ने एनआईबी की मांग में आवाज उठाई. एनआईबी का मकसद बड़ी परियोजनाओं के लिए एक ही खिड़की से सारी मंजूरियों को मुहैया कराना है जिससे कि अलग अलग मंत्रालयों की भागदौड़ और लालफीताशाही से बचा जा सके. कई बार इस प्रक्रिया में सालों लग जाते हैं.

हालांकि पर्यावरण मंत्रालय एनआईबी का विरोध कर रहा है. उसे लगता है कि यह मंत्रालय उसके अधिकार को कम कर देगा और साथ ही सरकार के भीतर कमियों को पकड़ने और सुधारने का तंत्र भी कमजोर पड़ेगा. पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा, "मौजूदा प्रस्ताव पूरी तरह अस्वीकार्य है क्योंकि यह महत्वपूर्ण फैसलों में अलग अलग मंत्रालयों की भूमिका को कमजोर करेगा." पर्यावरण मंत्रालय ने कई बड़े औद्योगिक और बुनियादी निर्मा की परियोजनाओं को रोक रखा है. नटराजन का प्रभाव सोनिया गांधी से उनकी करीबी के कारण भी ज्यादा है.#b

बुनियादी निर्माण से जुड़ी किसी परियोजना को 19 मंत्रालयों से औसतन 56 मंजूरियां लेनी पड़ती है जिनमें पर्यावरण से लेकर सुरक्षा तक का मसला शामिल है. पूरी प्रक्रिया में करीब 24 महीने तक लग जाते हैं. अब एनआईबी भी इन्हीं बाधाओं का सामना कर रहा है. वित्त मंत्री के आर्थिक मामलों के सचिव अरविंद मायाराम का कहना है, "किसी भी ऐसे फैसले के लिए जिसका कई मंत्रालयों पर असर होना हो आपको अंतर मंत्रालयी चर्चा करा कर सहमति हासिल करनी होती है." उन्होंने कहा कि फैसला तीन हफ्तों में लिया जा सकता है. सरकारी अधिकारियों का कहना है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने दो मंत्रालयों के बीच सहमति न बन पाने के बाद वित्त मंत्रालय से प्रस्ताव में बदलाव करने को कहा है. मंत्रालयों को राजी न कर पाने के लिए हालांकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भी आलोचना हो रही है. इन सब के बावजूद वित्त मंत्री उम्मीद कर रहे हैं कि उनका प्रस्ताव मंत्रालयों की लड़ाई के बीच उलझ कर नहीं रह जाएगा.

एनआर/एमजी(रॉयटर्स)

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