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दुनिया

चकमा शरणार्थियों को 50 साल बाद मिलेगी नागरिकता

भारत में 40,000 रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर तेज बहस हो रही है. इस बहस के बीच देश में दशकों से रह रहे चकमा और हजोंग शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दी जा रही है.

दुनिया भर में रोहिंग्या शरणार्थियों की बहस के बीच बांग्लादेश से पांच दशक पहले भारत आए चकमा और हजोंग शरणार्थियों को सीमित नागरिकता मिलने जा रही है. अधिकारियों का कहना है कि उन्हें जमीन या आदिवासी अधिकार नहीं दिये जा सकते हैं क्योंकि इससे टकराव की स्थिति बन सकती है.

भारत के गृह मंत्रालय ने कहा है कि वह 2015 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए उस फैसले को लागू करने जा रहा है, जिसके तहत 54000 चकमा और हजोंग शरणार्थियों को नागरिकता दी जानी थी. ये सभी शरणार्थी बौद्ध और हिंदू धर्म से ताल्लुक रखते हैं.

चकमा और हजोंग शरणार्थी भारत में बांग्लादेश के चटगांव से आये हैं. यह इलाका दशकों तक हिंसा का शिकार रहा, जिसकी वजह से हजारों लोगों विस्थापित हो गये. चकमा और हजोंग शरणार्थी भारत के अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा असम, मिजोरम और मेघालय राज्यों में आकर बसे.

असम के गुवाहाटी में उत्तर पूर्वी सामाजिक अनुसंधान केंद्र के एक सदस्य ने कहा, "चकमा और हजोंग बिना अधिकारों के दशकों से भटक रहे हैं. इसलिए यह अनिवार्य हो चला है कि उन्हें किसी तरह की नागरिकता दी जाये." उन्होंने कहा, "लेकिन दसियों हजार लोगों को छोटे पूर्वोत्तर राज्यों में अधिकार देना एक परेशानी हो सकती है. पर्याप्त नौकरियां नहीं हैं और जमीन भी कम है."

चकमा और हजोंग शरणार्थियों को नागरिकता देने का फैसला ऐसे समय आया है, जब भारत में रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर तेज बहस चल रही है. भारत सरकार ने रोहिंग्या मसले पर उच्चतम न्यायालय में दायर अपने जवाब में कहा है कि रोहिंग्या देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं. सरकार ने आशंका जताई है कि इनका कट्टरपंथी वर्ग भारत में बौद्धों के खिलाफ हिंसा फैला सकता है.

विश्लेषकों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हिंदू राष्ट्रवादी सरकार की योजना गैर-मुस्लिम प्रवासियों के पक्ष में रहने की है. चकमा और हजोंग शरणार्थियों को नागरिकता देना उसी योजना के तहत है. 2016 का सरकार का नागरिकता (संशोधन) विधेयक हिंदू, सिख और बौद्ध अवैध प्रवासियों को नागरिकता देने के योग्य बनाता है. इस साल के शुरुआत में सरकार ने तिब्बती शरणार्थियों को भारतीय पासपोर्ट जारी करना शुरू किया है. लेकिन वे भी जमीन नहीं खरीद सकते हैं.

अखिल भारतीय चकमा सोशल फोरम समूह के महासचिव पारितोष चकमा का कहना है, "नागरिकता हमारा कानूनी अधिकार है और हमें वह सभी अधिकार मिलने चाहिए जो एक भारतीय को मिलते हैं, जिसमें जमीन के अधिकार शामिल हैं." उन्होंने कहा कि वे भी आदिवासी लोग हैं, वे वहां काफी वक्त से रह रहे हैं. उनका पहनावा और खानपान भी वहां के लोगों की तरह ही है.

एसएस/एमजे (रॉयटर्स)

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