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विज्ञान

घृणा यानी, जिंदगी से प्यार

जिस तरह इंसान को किसी से अकारण ही स्नेह या प्यार हो जाता है. उसी तरह घृणा या घिन भी होती है. बदबूदार, अजीब सी लगने वाली चीजों से भागने की आदत कहीं न कहीं इंसान के लिए वरदान भी साबित होती है.

उल्टी, दस्त, मल-मूत्र या सड़ा खाना देखकर आम लोगों को घिन आती है. वो दूर भागने की कोशिश करते हैं. लंदन की वैज्ञानिक वैलेरी कर्टिस घिनाने की इसी आदत के जरिए इंसान के सामाजिक और निजी व्यवहार की परतें खोल रही हैं.

लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसीन की निदेशक वैलरी कर्टिस के मुताबिक घृणा या घिन, इंसान के व्यवहार को तय करती है. ये आदत तय करती हैं कि हम क्या पहनेंगे, क्या खाएंगे, क्या चुनेंगे और यहां तक कि खरीदारी में क्या पसंद करेंगे. कर्टिस मानती है कि घिन या घृणा इंसानी मनोविज्ञान का ऐसा कोना है जिसे अब तक भुलाया सा गया है. अक्सर डर, प्रेम और गुस्से पर ही मनोविज्ञानियों का ज्यादा जोर रहा है.

कर्टिस मजाक में कहती हैं कि वह 'डिसगस्टोलॉजिस्ट' यानी घिन विज्ञानी हैं. वह समझना चाह रही हैं कि घृणा किस ढंग से विपरीत लिंग के प्रति व्यवहार, समाजिक व्यवहार और जीवित रहने की इच्छा तय करती है. कर्टिस कहती हैं, "लोग बिना जाने परखे ही चीजों से घृणा करने लगते हैं. यह हमारे जीवन को कई तरह से प्रभावित करता है, जरूरी है कि हम इस बात को समझें कि यह किस कदर हमें प्रभावित करता है."

कर्टिस कई साल तक सार्वजनिक स्वास्थ्य व साफ सफाई बेहतर करने और मृत्यु दर कम करने पर काम कर चुकी हैं. लेकिन अब वो एकदम विपरीत धारा में शोध कर रही हैं. घिन पर काम करने के लिए उन्होंने बांग्लादेश, भारत, बुरकीना फासो, चीन, यूगांडा, विएतनाम, इंडोनेशिया और किर्गिस्तान में लोगों की साफ सफाई की आदतों का अध्ययन किया. 2002 में वो यूनिसेफ के कार्यक्रम से भी जुड़ी और 'हाथ धोओ' अभियान को बढ़ावा दिया. इन सब कोशिशों के बीच उन्होंने अलग अलग देशों में साफ सफाई के बारे में कई समानताएं और कई अंतर देखे. कार्टिस कहती हैं, "मैं बीते 30 साल से घिन को समझने की कोशिश कर रही हूं. इक्का दुक्का अपवादों को छोड़ दें तो दुनिया भर में मुझे एक बात हर जगह मिली कि, बॉडी प्रोडक्ट्स, सड़ चुका खाना और शरीर से निकलने वाले द्रव्य, ये चीजें लोग दूसरों के साथ नहीं बांटते. ये बुरी आदत है या खराब व्यवहार है."

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कर्टिस की किताब 'डोन्ट लुक, डोन्ट टच' इस महीने आने वाली है. किताब में वह कहती हैं कि घृणा की आदत की वजह से ही हमारे पूर्वज खुद को और भावी पीढ़ी को बचा सके. उनका तर्क है कि घृणा ने इंसान उन चीजों से दूर रखा जो उसे बीमार कर सकती थीं या जानलेवा साबित हो सकती थीं. कर्टिस के मुताबिक घृणा डार्विन के क्रमिक विकास के सिद्धांत की कड़ी है. वह कहती हैं, "बीमारी एक ऐसी चीज है जो इंसान को अंदर ही अंदर खाती है, इसीलिए घृणा करके आप कई चीजों से दूर हो जाते हैं. घृणा आंख और कान की तरह एक अंग है. इसका अपना काम है. जैसे पैर आपको एक जगह से दूसरी जगह ले जाते हैं वैसे ही घृणा आपको बताती है कि कौन सी चीजें चुनने से आप सुरक्षित रहेंगे और कौन सी नहीं छूनी चाहिए."

कर्टिस के मुताबिक घिन की आदत के चलते भी इंसान ने सामाजिक रूप से स्वीकार करने लायक व्यवहार बनाया, तमीज के समीकरण गढ़े. उनके मुताबिक, "जब कभी हम दूसरों (नए लोगों) के संपर्क में आते हैं तो घृणा अपना खेल शुरू कर देती है. ये तय करती है कि क्या हमें फलां इंसान के करीब जाना चाहिए, उससे बातचीत करनी चाहिए. लेकिन इसी के साथ हम इस बारे में भी सतर्क होते हैं कि हमारा व्यवहार उनमें घिन पैदा न करे."

कर्टिस कहती हैं कि घृणा ही हमें सामाजिक कायदे और नैतिकता में बांधती है, "यह ऐसी भावना है जो बताती है कि कैसे व्यवहार करें. ये समाज के लिए नैतिक ढांचा बनाने में मदद करती है. घृणा वाकई गजब की चीज है, जो बताती है कि सभी भावनाएं कैसे काम करती हैं."

ओएसजे/एएम (रॉयटर्स)