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ताना बाना

घाटी में मन के घायल होने का सिलसिला

जम्मू कश्मीर के लोग हिंसा को कितने ही साल से झेल रहे हैं. इसका असर उनके घरों पर, आर्थिक हालात पर, बच्चों की पढ़ाई पर, कारोबार पर...यानी जिंदगी के हर पहलू पर हुआ है. तो मन छलनी होने से कैसे बच पाएगा.

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हाल ही में आई एक रिपोर्ट कहती है कि कश्मीर में मानसिक समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं. श्रीनगर में रैनावाड़ी मानसिक अस्पताल में हमेशा हलचल रहती है. यह अस्पताल घाटी के उन चंद अस्पतालों में शुमार है जहां मानसिक समस्याओं का इलाज होता है. और यहां आने वाले ज्यादातर लोग वे हैं जो कश्मीर की अलगाववादी हिंसा से परेशान हैं.

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कश्मीर के गांव गांव में ऐसे लोग मिल जाते हैं जिन्होंने मौत को बेहद करीब से देखा है. शायद ही कोई ऐसा मिले जिनका कोई जानने वाला इस हिंसा का शिकार न हुआ हो. सबने मौत को जिंदगी से खेलते, उसे हराते देखा है. ऐसे लोगों में सैकड़ों रोजाना इस अस्पताल की लाइनों में खड़े दिखाई दे जाते हैं जो अपनी किसी मानसिक परेशानी का इलाज कराने आए हैं.

15 फीसदी एन्जाइटी डिसऑर्डर के शिकार

कश्मीर के जाने माने मानसिक रोग विशेषज्ञ मुश्ताक मारगूब करीब 15 साल से प्रैक्टिस कर रहे हैं. वह कहते हैं, "सूबे की 15 फीसदी जनता एन्जाइटी डिसऑर्डर के शिकार है. कुछ लोगों के लिए किसी खास वक्त पर जिंदगी थम जाती है और फिर वे उस दर्द को बार बार झेलते हैं. मौत और विनाश की

Kashmir Hurriyat Conference in Haft

भावुकता उन लोगों की मानसिक स्थिति पर हावी हो जाती है."

गुलाम बट ऐसी ही एक मिसाल हैं. उनके इलाके में दो साल पहले गोलीबारी हुई थी. वह अब काउंसलिंग ले रहे हैं और अपने परिवार के साथ अस्पताल आते हैं. वह बताते हैं, "उस दिन की घटना अब मेरी आंखों के सामने अक्सर आ जाती है. मैं डर जाता हूं किसी कोने में जाकर छिप जाता हूं. सामान्य होने में मुझे कुछ वक्त लगता है. मैं दवाई तो खा रहा हूं लेकिन डर अब भी बना हुआ है."

सेडेटिव का इस्तेमाल बढ़ा

डॉ. मरगूब बताते हैं कि सेडेटिव यानी शांतिकारक दवाओं का इस्तेमाल हाल के दिनों में तेजी से बढ़ा है. वह कहते हैं, "लोग मानसिक तनाव और भावकु परेशानियों बचने के लिए ऐसा कुछ भी ले लेते हैं जो उन्हें सामान्य नींद और राहत की स्थिति में पहुंचा दे"

मेडेसिन्स सान्स फ्रंटियर्स (एमएसएफ) नाम की एक स्वतंत्र मेडिकल एड एजेंसी ने अपने अध्ययन में पाया है कि लगभग एक तिहाई हिस्सा मानसिक रोगों का शिकार है. और जितने लोगों से बात की गई उनमें से 10 फीसदी ऐसे थे जिन्होंने किसी अपने को 1989 से 2005 के बीच खोया था.

एक दूसरा अध्ययन दिखाता है कि कश्मीर में बेरोजगार युवकों में से 29 फीसदी रिलैक्स होने के लिए धूम्रपान करते हैं. कुल जनसंख्या का लगभग 12 फीसदी हिस्सा, जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं, तनाव से निजात पाने के लिए नींद की गोलियां खाता है. चार फीसदी युवा नशीली दवाओं का सेवन करते हैं ताकि मानसिक परेशानियों से राहत पा सकें. और विशेषज्ञ मानते हैं कि कश्मीर में समस्या का हल नजर नहीं आ रहा इसलिए मनों के छलनी होने का यह सिलसिला लगातार बढ़ता रहेगा.

रिपोर्टः एजेंसियां/वी कुमार

संपादनः एन रंजन

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