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दुनिया

घाटा, वोट और निवेश से भरा बजट

भारतीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम जिस वक्त संसद में सालाना बजट पेश करेंगे, उनके सामने देश की गिरती आर्थिक विकास दर को फिर से ऊपर करना और विदेशी निवेश को बढ़ाना तो होगा ही, आम चुनाव की धार भी चमक रही होगी.

चिदंबरम के सामने निवेशकों का विश्वास जीतने का आखिरी मौका है क्योंकि यह यूपीए 2 का आखिरी पूर्ण बजट होगा. भारत पिछले एक साल में महंगाई और भ्रष्टाचार में कुछ और धंसा है और ऐसे में वित्त मंत्री के पास विदेशी निवेशकों को लुभाने के सीमित मौके हैं.

गुरुवार को पेश होने वाले बजट से पहले वित्त मंत्री चिंदबरम ने कुछ बातों का इशारा दे दिया है, जिनमें खर्चे में भारी कटौती भी शामिल है. लंदन स्थित निवेश कंपनी लालकैप के प्रमुख दीपक लालवानी का कहना है, "भारत का बजट पिछले कई साल के दौरान का सबसे छोटा बजट हो सकता है. कई विभागों में भारी कटौती हो सकती है." चिदंबरम ने पिछले महीने वैश्विक निवेशकों को इस बात का भरोसा देने की कोशिश की है कि भारत एक "जिम्मेदाराना बजट" पेश करेगा.

भारत को अपने कर्ज पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है ताकि उसकी रेटिंग और कम न की जाए. इससे अंतरराष्ट्रीय निवेशकों पर खासा असर पड़ सकता है. लालवानी का कहना है, "अगर रेटिंग और कम हुई तो भारत जंक श्रेणी में चला जाएगा. जो देश अंतरराष्ट्रीय आर्थिक शक्ति बनने की कोशिश कर रहा है, उसके लिए यह बड़ी बदनामी होगी."

भारत की कोशिश है कि अगले पांच साल में वह बुनियादी ढांचे पर 1,000 अरब डॉलर का निवेश हो. पिछले साल अप्रैल से दिसंबर के बीच भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लगभग 42 फीसदी गिरा है. जानकारों का कहना है कि अगर खर्चों में कटौती की गई, तो इसका अर्थव्यवस्था की सेहत पर काफी बुरा असर पड़ेगा. इस साल भारत का विकास पांच से साढ़े पांच फीसदी के बीच होता बताया जा रहा है.
एचएसबीसी के वरिष्ठ अर्थशास्त्री लीफ एसकेसन का कहना है, "सरकार को एक मुश्किल डगर पर चलना है. एक तरफ आर्थिक भरोसे की कमी और दूसरी तरफ कम विकास का खतरा." हालांकि वित्त मंत्री चिदंबरम खाने का अधिकार वाली पार्टी की नीति पर भरोसा कर रहे हैं.

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पिछले चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने वादा किया था कि सभी को खाना मिलेगा. भारत में सवा अरब की आबादी का 60 फीसदी गरीब माना जाता है, जिन्हें कम कीमत पर राशन देने की योजना है. चिदंबरम का दावा है कि तमाम मुश्किलों के बाद भी वह भारत में छह से सात फीसदी विकास की राह आसान कर सकते हैं. हालांकि कई अर्थशास्त्रियों को इस पर संदेह है. एक समय में भारत का विकास नौ फीसदी को पार कर गया था और लगने लगा था कि चीन की तरह वह भी दोहरे आंकड़े में विकास हासिल कर सकता है लेकिन यह कभी नहीं हो पाया.

दुनिया भर में आर्थिक मंदी के दौर में पांच से छह फीसदी विकास भी सपने की तरह है. लेकिन भारत का कहना है कि वह नौ से 10 फीसदी विकास चाहता है. भारत के प्रमुख कारोबारी अखबार बिजनेस स्टैंडर्ड के संपादकीय निदेशक टीएन नीनन का कहना है, "जो बात कभी बिग बैंग की तरह लगती थी, अब रिरियाने की तरह लग रही है. निश्चित तौर पर चिदंबरम का आखिरी बजट देश की अर्थव्यवस्था को उबारने वाला होना चाहिए."
एजेए/ एएम (एएफपी)

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