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विज्ञान

घर लौट आए परिंदे

वसंत आ गया है और साथ ही लौट आई हैं चिड़िया जो सर्दी के मौसम में यूरोप को छोड़ अफ्रीका चली गयी थीं. लेकिन मौसम में हो रहे बदलाव और इंसानी गतिविधियों से इनकी संख्या लगातार कम हो रही है.

नीले, काले और सफेद पंखों वाली यूरोप की ये चिड़िया गर्म मौसम की तलाश में हजारों किलोमीटर का सफर तय कर अफ्रीका पहुंचती हैं और मौसम ठीक होते ही प्रजनन करने के लिए अपने घर लौट आती हैं. 'इटेलियन इंस्टीट्यूट फॉर द प्रोटेक्शन एंड एक्स्प्लोरेशन ऑफ वाइल्ड एनिमल्स' (इस्तरा) के अध्यक्ष फर्नांडो स्पीना बताते हैं, "प्रवासी पक्षी प्रजनन की जगह पर दोबारा तभी लौटते हैं जब वहां उनके खाने के लिए कीड़े इत्यादि मौजूद हों. इस समय पेड़ों पर फिर फूल खिलने लगते हैं और पेड़ों पर कई कीड़े मौजूद होते हैं जिनसे वे अपने बच्चों का पेट भर सकते हैं".

बदलते मौसम की मार

स्पीना बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण यूरोप के कई हिस्सों में वसंत जल्दी आने लगा है, "रिसर्च ने दिखाया है कि पाईड फ्लायकैचर जैसे कई पक्षी, जो सहारा के दक्षिणी हिस्से में सर्दी का समय बिताते हैं, अब काफी देर से लौटते हैं". ऐसे में ज्यादा कीड़े नहीं मिलते और इन पक्षियों को अपने बच्चों को पालने में काफी दिक्कत का सामना करना पड़ता है.

'बार्न स्वालो' नाम की चिड़िया ने यूरोप जल्दी लौट आने का समाधान यह निकाला है कि अब वे अफ्रीका में ज्यादा दूर जाते ही नहीं, "इसका मतलब यह हुआ कि अब वे अफ्रीका के उत्तरी हिस्से में ही सर्दियां बिता लेते हैं". लेकिन इसका नुकसान यह होता है कि वे ज्यादा सूखे इलाकों में ही रह जाते हैं, जहां नमी भी काफी कम होती है और खाने के लिए कीड़े भी कम होते हैं. स्पीना बताते हैं कि सूखा पड़ने और जमीन के लगातार बंजर होने से भी प्रवासी पक्षियों की मुश्किलें बढ़ रही हैं.

संरक्षण भी मुश्किल

एक ओर बदलता मौसम तो दूसरी और इंसानों द्वारा लगातार जंगलों का काटा जाना भी मुश्किलें खड़ी कर रहा है. साथ ही कई देशों में तो इन पक्षियों का शिकार भी किया जाता है. 'कनवेनशन फॉर माइग्रेट्री स्पीशीस' (सीएमएस) के उपाध्यक्ष बेर्ट लेनटेन बताते हैं कि इन पक्षियों का संरक्षण भी कोई आसान काम नहीं है, "प्रवासी पक्षी हजारों किलोमीटर दूर का सफर तय करते हैं. इसलिए बहुत से देशों में सक्रीय हुए बिना इनकी प्रजातियों को बचाना नामुमकिन है. इसीलिए सीएमएस के अंतर्गत हम अंतरराष्ट्रीय सहयोग की उम्मीद कर रहे हैं". अब तक 119 देश इस समझौते से जुड़ चुके हैं.

सीएमएस केवल प्रवासी पक्षी ही नहीं, बल्कि सभी प्रवासी जीवों की सहायता के लिए बना है. लेकिन जहां हाथी और बंदर जैसे जानवर एक या दो देशों की ही सीमाओं को पार करते हैं, वहीं ये पक्षी न जाने कितने देशों की सीमाओं को पार कर लेते हैं. 2006 से हर साल मई में विश्व प्रवासी पक्षी दिवस मनाया जाता है.

बीना चहचहाहट का वसंत

लेनटेन इस दिवस की स्थापना करने वालों में से एक हैं. वह बताते हैं, "2005 में जब पहली बार बर्ड फ्लू यूरोप पहुंचा तब पक्षियों की छवि काफी खराब हो गयी थी. कई लोग उन्हें मौत का सौदागर समझने लगे. हम लोगों को याद दिलाना चाहते थे कि परिंदे का होना दरअसल एक अच्छा एहसास लाता है." लेनटेन कहते हैं कि ऐसे दिवस से अगर युवाओं में पक्षियों के प्रति अच्छी भावना उत्पन्न की जा सके तो इन पक्षियों को बचाने में आसानी होगी जो लुप्त होने की कागार पर खड़े हैं.

स्पीना बताते हैं कि यह प्रवासी पक्षी जैव विविधता के लिए भी बेहद अहम हैं और पारिस्थितिक तंत्र के लिए भी, "यानी इनका होना हम इंसानों के लिए भी जरूरी है. प्रवासी पक्षी कई फूलों में परागन में भी बड़ी भूमिका निभाते हैं. वे कीड़ों की संख्या को काबू में रखने के लिए भी जरूरी हैं और साथ ही उनकी एक सांस्कृतिक अहमियत भी है. क्या आप ऐसे वसंत की कल्पना कर सकते हैं जिसमें पक्षियों की चहचहाहट सुनने को ना मिले?"

इसी को देखते हुए इस साल इटली का एक गायक मंडल जर्मनी पहुंचा ताकि लोगों में जागरूकता फैलाई जा सके और इन खूबसूरत प्रवासी पक्षियों के अस्तित्व को बचाया जा सके.

रिपोर्ट: आइरीन क्वेल/आईबी

संपादन: मानसी गोपालकृष्णन

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