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दुनिया

घरों में घुसकर सैन्य अभ्यास

आप घर में परिवार के साथ खाना खा रहे हों और सैनिक घुस आएं और बिना कोई वजह दिए गिरफ्तारियां करने लगें तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी? एक ऐसे ही ट्रेनिंग कार्यक्रम के कारण इस्राएली सेना की दुनिया भर में आलोचना हो रही है.

इस ट्रेनिंग कार्यक्रम में अभ्यास में नकली गिरफ्तारियों के अलावा फलस्तीनी कम्यूनिटी सेंटर और घरों पर नकली छापे भी शामिल हैं. हेबरन कम्यूनिटी सेंटर में एक शाम अहमद आमरो अपने साथियों के साथ खाना खाने की तैयारी कर रहे थे, तभी उन्हें सैनिकों ने घेर लिया., "करीब 12 लोग अलग अलग दिशा से सामने आए. फिर कुछ और सैनिक आए और उन्होंने आकर सारे दरवाजे बंद कर दिए. वे एक कमरे से दूसरे कमरे, ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर चक्कर काटने लगे. उनमें से एक जख्मी होने की एक्टिंग कर रहा था और दूसरा उसे स्ट्रेचर पर खींच रहा था. हमें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है और वे ऐसा क्यों कर रहे हैं."

अहमद को बाद में समझ आया कि यह कोई असली छापा नहीं, बल्कि सैनिकों के ट्रेनिंग कार्यक्रम का हिस्सा था. इसके बाद न तो कोई बताने नहीं आया कि ये सब उन्होंने क्यों किया और ना ही जो हुआ उसके लिए माफी मांगी गई.

मानवाधिकारों का हनन

इस्राएल में मानवाधिकार संगठन इस तरह की 40 से ज्यादा घटनाओं का लिखित ब्यौरा दे चुके हैं. ये संगठन मिलकर इस कार्यक्रम के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं. उनका मानना है कि इस्राएली सैन्य विभाग का इस तरह का कार्यक्रम अमानवीय है. उनमें से एक येश दीन ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि वह इसे गैर कानूनी घोषित करे.

येश दीन की वकील एमिली शेफर ने बताया कि इस तरह की कई घटनाएं हो रही हैं. इनमें नकली सड़कें बनाना, नकली गिरफ्तारियां करना, यहां तक कि गाड़ियों में बम छुपा देना भी शामिल है, ताकि खोजी कुत्तों को जांच करना सिखाया जा सके. इससे कई बार गाड़ियों को नुकसान भी पहुंचता है.

शेफर ने कहा कि फलस्तीनियों को ऐसी स्थिति में कुछ समझ नहीं आता. उनके लिए सब कुछ असली छापों और गिरफ्तारियों जैसा ही होता है. कई बार उनके कुछ समझ पाने से पहले ही अफरा तफरी और घबराहट का माहौल फैल चुका होता है. कई फलस्तीनी जो खुद को खतरे में समझते हैं, अक्सर खुद को बचाने की कोशिश करने लगते हैं.

विरोध के स्वर

इस कार्यक्रम में शामिल कई अधिकारियों ने भी अब इसके खिलाफ बोलना शुरू कर दिया है. पूर्व में सैनिक रह चुके लोगों के एक ग्रूप ने भी इसके खिलाफ आवाज उठाने का आह्वान किया है. उन्होंने कहा कि वे खुद भी इस कार्यक्रम से उतने ही परेशान हैं जितने कि फलस्तीनी. उन्होंने कहा कि इस्राएल में सैन्य अभ्यास के मकसद से तैयार की गई ऐसी कई अन्य सुविधाएं हैं जिनके रहते सैनिकों को ऐसा करने की जरूरत नहीं है. वे नकली गावों में इस तरह के अभ्यास कर सकते हैं.

2009 में बेथलेहम के पास एक गांव में अंजाम दिए गए ऐसे ही एक अभ्यास में अमित ग्वारयाह इस तरह के एक कार्यक्रम में शामिल थे. उन्होंने बताया, "सैनिकों के प्रशिक्षण के लिए कोई और दूसरा बेहतर रास्ता होना चाहिए. इसमें न सिर्फ दूसरों की जान को खतरा होता है, बल्कि खुद उनकी जान भी जा सकती है."

डराने की कोशिश

अमित मानते हैं कि इस कार्यक्रम का मकसद प्रशिक्षण नहीं है, बल्कि फलस्तीनियों को यह याद दिलाना है कि उन पर नजर रखी जा रही है. उन्होंने कहा, "अगर इस्राएली सैन्य विभाग फलस्तीनियों को डराना चाहते हैं तो ऐसा हो रहा है. लेकिन क्या भविष्य के लिए यह अच्छा है? मुझे शक है. क्या यह फलस्तीनियों के लिए अच्छा है? मैं विश्वास से कह सकता हूं, नहीं. डरे हुए लोग ही गलतियां करते हैं."

येश को लिखे एक पत्र में सेना के वकील ने ट्रेनिंग कार्यक्रम की वकालत करते हुए कहा है, "सेना की योग्यता बनाए रखने के लिए यह जरूरी है." साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकारा कि एक मामले में ऐसा जरूर हुआ है, जब सेना को अपनी उपस्थिति दिखानी थी और उसने ऐसा किया.

एक प्रवक्ता ने इस बारे में ज्यादा बताने से इनकार करते हुए कहा कि स्थिति असल में इससे कहीं ज्यादा गंभीर है. एमिली शेफर कहती हैं, "येश दीन मानते हैं कि यह पॉलीसी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के मूल बिंदुओं का उल्लंघन है, और हमें नहीं लगता कि इन कानूनों के उल्लंघन के बगैर इसे जारी रखा जा सकता है."

रिपोर्ट: मारीके पीटर्स/ एसएफ

संपादन: ईशा भाटिया

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