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दुनिया

घरों पर देखभाल करती पोलैंड की केयरटेकर

जर्मनी में बुजुर्गों की तादाद बढ़ रही है. बुढ़ापे में उनकी देखभाल के लिए नर्सों की जरूरत भी बढ़ रही है, लेकिन कामगारों की कमी के कारण पूर्वी यूरोप की एक लाख से ज्यादा महिलाएं नर्सिंग के क्षेत्र में काम कर रही है.

इन नर्सों में से कुछ उन परिवारों में भी रहती हैं, जहां वे काम करती हैं. जोसेफा गॉसे 58 साल की हैं. वे बताती हैं, "पोलैंड में मेरे लिए काम पाना बहुत मुश्किल है." इसलिए जर्मनी में काम पाकर उन्हें खुशी हुई है. यूं भी जर्मनी में पोलैंड की तुलना में ज्यादा मेहनताना मिलता है. वह ब्रेमेन में पार्किंसंस के एक मरीज की देखभाल करती हैं और उसी के घर में रहती है. उसके पास एक कमरा है, लेकिन उसमें बाथरूम और किचन नहीं है. बाथरूम और किचन वह वहां रहने वाले दंपति के साथ बांटती है. इतना करीब रहने से विवाद होना स्वाभाविक है, लेकिन जोसेफा कहती हैं कि उनके बीच बनती है.

बनाए रखना जरूरी भी है, कहती है पोलैंड की नर्स बेयाटा बाइदा जिन्होंने एक साल पहले बुजुर्गों की देखभाल के लिए नर्स दिलाने के लिए सीनियर्स एंकर एजेंसी बनाई है. वे खुद 1988 में काम करने जर्मनी आई थी और 15 साल तक काम किया. "मेरा बिजनेस आइडिया है कि एक व्यक्ति एक व्यक्ति की देखभाल करे न कि मिनट के हिसाब से." उनका मानना है कि सबसे अच्छी देखभाल घर पर ही हो सकती है. बाइदा कहती हैं कि सबसे अच्छी दवा ध्यान देना है, इसलिए देखभाल की जरूरत वाले लोगों को घर पर रहने की संभावना होनी चाहिए. इस तरह की सर्विस जर्मन नर्सों के साथ मुमकिन नहीं. पोलैंड की नर्सों को टैक्स काटने के बाद 1100 यूरो मिलते हैं जो पोलैंड में होने वाली कमाई का तिगुना है.

किफायती और बेहतर

उत्तरी सागर के तट पर स्थित गोदी नगर ब्रेमरहाफेन के आस पास इस समय 15 महिलाएं बुजुर्गों की देखभाल का काम करती हैं. उनमें मार्जेना वोइचिक भी हैं जो जून से हरमन क्लाउस मोलेनकंप के घर के एक हिस्से में बने फ्लैट में रहती हैं. यह लंच का समय है. मार्जेना 78 वर्षीय मोलेनकंप की मदद के लिए भागती हैं. अकेले वे सोफा से अपने वॉकर तक नहीं पहुंच सकते, किचन तक तो कतई नहीं. पिछले पांच साल से उनके लिए हर कदम तकलीफदेह रहा है. उनकी पत्नी की जनवरी में मौत हो गई. "पहले मैंने अकेले रहने की कोशिश की, यह बहुत ही मुश्किल था."

किचन में वे डगमगा जाते हैं और उनका हाथ कट जाता है. वे कहते हैं जब उन्हें जरूरत होती थी तो जर्मन केयरटेकर उनके पास नहीं होते थे. एक लोकल अखबार में उन्होंने सीनियर एंकर एजेंसी के बारे में पढ़ा जो लोगों के घरों में पोलैंड की केयरटेकरों की नौकरी लगवाते हैं. उन्होंने इस सर्विस का फायदा उठाने का फैसला किया. बेयाटा बाइदा अकेले काम करती हैं. वे बताती हैं, "ये महिलाएं पोलैंड की पार्टनर एजेंसी में काम करती हैं. वह कंपनी कानूनी रूप से अपने कर्मचारियों को यूरोप के दूसरे देशों में भेज सकती है." सब कुछ कानूनी है, यूरोपीय कानून का पालन होता है.

जोसेफा गॉसे असल में एक प्रशिक्षित कुक हैं. उसके बाद उन्होंने पोलैंड में केयरटेकर बनने का सर्टिफिकेट लिया. वे जर्मन दंपति के लिए नाश्ता बनाती हैं, कपड़े धोती हैं और उनके साथ टहलने जाती हैं. वह बस अपने पार्किंसंस मरीजों के सामने होती है, यह देखती कि कहीं वे गिर न जाएं. आठ घंटे देखभाल, आठ घंटे स्टैंडबाय और आठ घंटे सोना, यह है उनका सामान्य काम का दिन. रात में यदि जरूरत हो जाए तो जोसेफा उठ जाती हैं, मदद करती हैं, वे ना नहीं करतीं.

लक्जरी या शोषण

जर्मनी के कुछ सर्टिफाइड केयरटेकरों ने बाइदा पर केयरटेकरों के लिए गुलामों जैसी हालत पैदा करने का आरोप लगाया है. इन आरोपों के बाद ब्रेमरहाफेन के मीडिया में इस मुद्दे पर काफी खुलकर चर्चा हुई. वे कहती हैं, "यह मेरे लिए सबसे अच्छा विज्ञापन था. सच कहें तो वे मुझे अपना प्रतिद्वंद्वी समझते हैं." पोलैंड 2004 से यूरोपीय संघ का सदस्य है. वह 2011 से मुक्त आवाजाही के शेंगेन का सदस्य है. इसके तहत पोलैंड के लोगों को दूसरे यूरोपीय देशों में रहने और काम करने की छूट है. "इसलिए हमारे पास जर्मन बाजार में देखभाल की सुविधा ऑफर करने का मौका है."

जर्मन परिवारों में देखभाल के क्षेत्र में पूर्वी यूरोप की करीब एक लाख महिलाएं काम करती हैं. उनके लिए महीने में 1800 यूरो वेतन और रहने के लिए कमरा तथा खाना पीना देना पड़ता है. बीमा कंपनियों से 500 यूरो तक मदद मिल जाती है, लेकिन सबके लिए बाकी की राशि का इंतजाम आसान नहीं. मोलेनकंप की अपनी कंपनी थी, जिसे उन्होंने बाद में बेच दिया. उनके बच्चे नहीं हैं. उनके आलीशान बंगले में लकदक फर्नीचरों वाला ड्रॉइंग रूम, डाइनिंग रूम और बड़ा सा किचन है. मार्जेना आज वेजिटेबल सूप बना रही है. सब कुछ ताजा, ऑर्गेनिक सब्जियां.

उसकी बॉस अपने सर्विस के बारे में कहती हैं, "हम आराम का एक टुकड़ा देते हैं." भले ही वह अपने केयरटेकरों का रोजमर्रा न जानती हो, लेकिन उनकी वजह से बहुत से लोगों के लिए बुढ़ापे में अपने घर में रहना संभव हो रहा है. वे कहती हैं, "आपको पता ही है, पुराने पेड़ को कहीं और नहीं लगाया जा सकता."

रिपोर्ट: गोडहार्ड वायरर/एमजे

संपादन: आभा मोंढे

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