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दुनिया

ग्वांतानामो में पांच साल

ग्वांतानामो जेल में लोगों पर हुई त्रासदियां दुनिया से नहीं छिपी हैं. अब जर्मनी में ग्वांतानामो से छूटे एक कैदी पर फिल्म बनी है जो उसके साथ हुए अत्याचार की दास्तान सुनाती है.

सिनेमा हमेशा से समाज और राजनीति में हो रही गतिविधियों को पर्दे पर उतारने की कोशिश करता है. राजनीति पर फिल्में बनाने के लिए फिल्मनिर्माताओं के पास सटीक जानकारी होना बेहद जरूरी है. फिल्म सफल होगी या नहीं यह मुख्य रूप से फिल्म की स्क्रिप्ट और निर्देशक की भावनाओं को पर्दे पर उतारने की क्षमता पर निर्भर करता है. जर्मन फिल्म '5 यारे लेबेन' अंग्रेजी शीर्षक 'फाइव यीअर्स' को एक सफल फिल्म कहा जा सकता है.

'जर्मन तालिबान'

फिल्म तुर्क मूल के जर्मन निवासी मुरात कुरनाज की कहानी है. अमेरिका में 11 सितंबर 2011 को हुए आतंकी हमलों के कुछ समय बाद ही मुरात को पाकिस्तान से गिरफ्तार किया गया और ग्वांतानामो जेल ले जाया गया जहां उसे पांच साल बिताने पड़े.

मुरात की गिरफ्तारी के कुछ समय बाद ही यह बात साफ हो गयी थी कि वह कोई आतंकवादी नहीं है और ना ही उसका अमेरिका में हुए हमलों से कोई लेना देना है. मुरात को छुड़वाने के लिए जर्मनी में कई प्रदशन हुए, कानूनी कार्रवाई शुरू हुई और अंत में उसे रिहा कर दिया गया.

मुरात को जर्मनी में 'जर्मन तालिबान' के नाम से जाना जाता है. दरअसल यह नाम उसे यहां के अखबार 'बिल्ड' से मिला जिसे सनसनीखेज पत्रकारिता के लिए जाना जाता है. मुरात के खिलाफ भले ही आरोप तय ना हुए हों, लेकिन अखबार ने उस पर तालिबान होने का ठप्पा लगा दिया.

लोकतंत्र का स्कैंडल

कुछ साल पहले जर्मन लेखक रॉजर विलेमसेन ने 'हियर श्प्रिष्ट ग्वांतानामो' नाम की किताब लिखी, जो अंग्रेजी में 'ग्वांतानामो स्पीक्स' के नाम से प्रकाशित हुई. किताब में विलेमसेन ने ग्वांतानामो के कैदियों से इंटरव्यू कर उनके अनुभवों को बताया है. उनका कहना है, "ग्वांतानामो को अधिकतर उत्तेजना के तौर पर देखा जाता है, लोकतंत्र में हुए एक स्कैंडल के तौर पर नहीं." अब निर्देशक श्टेफान शालेर इसी स्कैंडल पर रोशनी डालने की कोशिश कर रहे हैं.

शोलर बताते हैं कि कुछ साल पहले जब उन्होंने इस फिल्म पर काम करने का फैसला किया तो उन्होंने खुद से कुछ सवाल किए. उन्होंने सोचा कि अगर मुझे पांच साल के लिए कैद कर दिया जाए तो मैं क्या करूंगा? मैं क्या करूंगा अगर मुझसे मेरे सभी अधिकार छीन लिए जाएंगे? मेरे जीवन के सबसे अहम साल मुझसे ले लिए जाएं, सांस लेने के लिए हवा और निजता, सब छीन लिया जाए.

2001 में जब मुरात को गिरफ्तार किया गया था तब उसकी उम्र महज 19 साल थी. फिल्म में मुरात के अलावा मुख्य किरदार उस अफसर का है जो मुरात से पूछताछ के लिए जिम्मेदार था. फिल्म में ऐसे दृश्य हैं जहां देखा जा सकता है किस तरह मुरात को तड़पाया गया और यातनाएं दे कर उसे गलत आरोप स्वीकारने के लिए उकसाया गया. हालांकि उसने इन यातनाओं के आगे भी अपनी हिम्मत नहीं हारी. श्टेफान कहते हैं कि मुरात से ऐसा कबूल करवाने का एक ही उद्देश्य था कि उसकी हिरासत को वैद्य ठहराया जा सके.

राजनैतिक विफलता

31 साल के शोलर ने 2005 में लुडविग्सबुर्ग की फिल्म एकैडमी में पढ़ाई शुरू की. यहां पहुंचने से पहले से ही वह मुरात के मामले पर नजर रखे हुए थे, "फिल्म स्कूल में डिग्री मिलने से पहले ही मैं इस मामले को ध्यान से देख रहा था और मैं मुरात के वकील बेर्नहार्ड डोके से भी मिला".

बेगुनाह साबित हो जाने के बाद भी जर्मनी ने मुरात को स्वीकारने से इनकार कर दिया. इस दौरान मुरात को किन परेशानियों से गुजरना पड़ा यह भी फिल्म में दिखाया गया है. श्टेफान का कहना है कि उनकी यह फिल्म राजनैतिक विफलता को दर्शाती है. इस साल जनवरी में फिल्म को मैक्स ओफुएल्स फेस्टिवल में दो इनाम मिले हैं. अब यह फिल्म जर्मन सिनेमा घरों में रिलीज होने जा रही है. उम्मीद की जा रही है कि यह मानवाधिकार हनन की ओर लोगों का ध्यान खींच सकेगी.

रिपोर्ट: योखेन कुएर्टेन/आईबी

संपादन: मानसी गोपालकृष्णन

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