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विज्ञान

ग्लोबल वॉर्मिंग से बढ़ते 'समुद्री रेगिस्तान'

ग्लोबल वॉर्मिंग के बढ़ते दुष्प्रभावों से अब धरती का कोई भाग अछूता नहीं है. कहीं गरमी से पिघलते ग्लेशियर, अतिवृष्टि से डूबती तो कभी सूखे से तिड़कती जमीन से लेकर समुद्र भी अब बदलती जलवायु के कहर से कराह रहे हैं.

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ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण नुकसान सिर्फ जमीन पर ही नहीं बल्कि महासागरों पर भी होने लगा है. हवाई यूनिवर्सिटी और अमेरिका के नेशनल मरीन फिशरीज सर्विस द्वारा समुद्री पारिस्थिकीय तंत्र पर प्रकाशित एक रिपोर्ट से पता चला है कि अब समुद्र में भी 'रेगिस्तान' बनने लगे हैं.
हालांकि यह सुनने में बड़ा अजीब लगता है क्योंकि रेगिस्तान में तो पानी होता ही नहीं, जबकि इन समुद्री रेगिस्तानों में पानी तो भरपूर है लेकिन समुद्री जीवन के लिए जरूरी ऑक्सीजन गायब हो रही है.
इस रिपोर्ट के मुताबिक उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के समुद्रों में पिछले पांच दशकों से लगातार ऐसे क्षेत्र बनते जा रहे हैं जहां पानी में से ऑक्सीजन गायब हो रही है. नतीजन अब समुद्र में भी निर्जीव रेगिस्तान बनने शुरू हो गए हैं.
वैज्ञानिकों के मुताबिक समुद्री जल में जलीय जीव-जंतुओं और पादपों के लिए एक निश्चित मात्रा में ऑक्सीजन तथा कुछ

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सब पर पड़ रही है ग्लोबल वॉर्मिंग की मार

तत्वों का होना बेहद जरूरी है लेकिन ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण गरमाते समुद्री पानी से यह विशेषता खत्म हो रही है जो समुद्री पारिस्थतिकी तंत्र के लिए गंभीर खतरा बन गया है. वैज्ञानिकों ने कम ऑक्सीजन या न्यूनतम ऑक्सीजन वाले समुद्री क्षेत्र को 'ओशियन डेजर्ट जोन' या 'समुद्री रेगिस्तान' का नाम दिया है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ती मानव गतिविधियों के कारण भी समुद्रों की सतह गरम होने से इसके पानी में ऑक्सीजन घुलने की क्षमता कम होती जा रही है जिससे यहां भी निर्जीव क्षेत्र यानी रेगिस्तान बनने लगे हैं.
वैज्ञानिकों के अनुसार पिछले 30 सालों में भूमध्य रेखा में उप उष्णकटिबंधीय जलधाराओं के आसपास और पूरी धरती के महासागरों का लगभग 51 मिलियन वर्ग किलोमीटर समुद्री क्षेत्र निर्जीव हो गया है. इसे ही समुद्री रेगिस्तान के नाम से पुकारा जा रहा है.
वैज्ञानिक इस बात से भी खासे चिंतित हैं कि समुद्री रेगिस्तान बढ़ने की यह रफ्तार उनके अनुमान से भी कहीं ज्यादा तेज साबित हुई है.
समुद्र का अध्ययन करने के लिए रिमोट सेंसिंग के जरिए पानी के तापमान को विविध रंगों से आंका जाता है. इस 'रिमोट सेंसर्ड कलर डाटा' का उपयोग समुद्री पानी में ऑक्सीजन, क्लोरोफिल व अन्य घटकों की मात्रा मापने के लिए किया जाता है. गौरतलब है कि पानी में क्लोरोफिल की मात्रा में होने वाली कमी या वृद्धि समुद्री जीवन को बेहद नुकसान पहुंचा सकती है.
यह आंकड़े दोनों गोलार्धों के उत्तरी और दक्षिणी प्रशांत महासागर, उत्तरी और दक्षिणी अटलांटिक महासागर तथा भूमध्य रेखा के बाहर से लिए गए हैं जिनसे पता चलता है कि समुद्री पानी के तापमान में होने वाले बदलाव से कम क्लोरोफिल वाली समुद्री सतह में हर साल औसतन 0.8 से 4.3 प्रतिशत का इजाफा हुआ है

Grönland Dänemark Deutschland Eisfjord bei Ilulissat

पिघलते ग्लेशियर, पर्यावरण की बढ़ती मुश्किलें

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एक अनुमान के मुताबिक इन सभी महासागरों में कम क्लोरोफिल वाली समुद्री सतह में वर्ष 1998 से लेकर वर्ष 2006 में 15 प्रतिशत या 6.6 मिलियन वर्ग किलोमीटर की वृद्धि दर्ज की गई है.
इसके अलावा आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि पिछले नौ साल में समुद्री सतह के औसत तापमान में भी बढ़त देखी गई है, जो समुद्री पारिस्थिकीय तंत्र पर विपरीत असर डाल रही है.
उष्णकटिबन्धीय समुद्र के छिछले पानी को असंख्य जीवों का स्वर्ग कहा जाता है पर तापमान में होते इन बदलावों के कारण प्रवाल, शैवाल तथा अन्य नाजुक प्रजातियों पर लुप्त हो जाने का खतरा बना हुआ है.

सौजन्यः संदीप सिसोदिया (वेबदुनिया)

संपादनः ए कुमार