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ब्लॉग

ग्रीस पर अब नहीं रहा भरोसा

ग्रीस के प्रधानमंत्री ने बचेखुचे भरोसे को भी खत्म कर दिया. लेनदारों के सामने अब कोई रास्ता नहीं बचा. सोमवार को हुई बैठक के फैसले बेमायने लगने लगे हैं. ऐसे में बस ग्रेक्सिट का ही विकल्प बचा है, कहना है बेर्न्ड रीगर्ट का.

यूरोजोन की ग्रीस पर हुई बैठक के बाद 48 घंटे के लिए उम्मीद की जो किरण जगी थी, अब वह एक बार फिर अंधेरे में डूबती नजर आ रही है. बैठक में यह फैसला लिया गया कि दिवालिया हो चुके इस देश को तभी और कर्ज दिया जा सकता है, अगर वह वाकई सुधारों को जल्द से जल्द अमल में लाए. लेकिन अलेक्सिस सिप्रास इस बारे में क्या कर रहे हैं?

ग्रीस के प्रधानमंत्री ने एक बार फिर टीवी इंटरव्यू में अपने सहयोगियों के खिलाफ जहर उगला. उनका कहना है कि उन्हें हस्ताक्षर करने पर मजबूर किया जा रहा है, सुधारों का दावा झूठा है और वे खुद इन्हें स्वीकारना नहीं चाहते. लेकिन इसके बावजूद लेनदारों से अरबों की राशि लेने के लिए ग्रीस संसद के लिए इन्हें मंजूरी देना जरूरी है. सिप्रास ने बगैर पलकें झपकाए ये सब कहा. क्या कर्जदाता वाकई इस व्यक्ति पर भरोसा कर सकते हैं? नहीं! इस हरकत के बाद तो बिल्कुल भी उम्मीद नहीं की जा सकती कि इस वामपंथी लफ्फेबाज नेता ने जिन शर्तों पर हस्ताक्षर किए हैं, वह सच में उनका पालन भी करेगा. क्या वाकई इस अव्यवस्थित लोकलुभावक नेता को 86 अरब यूरो दिए जाने चाहिए?

सपने दिखा रहे हैं सिप्रास

जिस किसी को भी लगता है कि अलेक्सिस सिप्रास के नेतृत्व वाली सरकार यूरोपीय आयोग, यूरोपीय केंद्रीय बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की तिकड़ी की शर्तों को पूरा कर देगी, वह सपने देख रहा है. इसके अलावा सोमवार सुबह सिप्रास ने जिन शर्तों को मानने का वायदा किया है, एक हफ्ता पहले ही ग्रीस के लोगों ने जनमतसंग्रह में उसे खारिज कर दिया था.

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एक अथाह घड़े में कौन अपने पैसे फेंकना चाहेगा?

ऐसे में जर्मनी के वित्त मंत्री वोल्फगांग शॉएब्ले ने ब्रसेल्स में ग्रीस को ले कर जो अविश्वास व्यक्त किया, वह बिलकुल सही लगता है. ग्रीस के लोग भले ही उनसे सहमत ना हों लेकिन जर्मनी की मर्जी के बिना कुछ भी नहीं हो सकता. ग्रीस को यूरोजोन से निकाल कर अलग कर देना एक व्यवहारिक विकल्प है क्योंकि फिलहाल ग्रीस के जो हालात हैं, उन्हें देखते हुए तो तीसरे राहत पैकेज को मंजूरी देना उचित नहीं लगता.

यूरोपीय संघ के कुछ सदस्य ग्रीस की मदद के लिए राजी नहीं हैं और उनके पास इसकी सही वजह भी है. वित्त मंत्री शॉएब्ले ने इस पूरी योजना को ही "व्यर्थ" बताया है. तो अब क्या? सैद्धांतिक रूप से ईयू सदस्य देश द्विपक्षीय वार्ता कर ग्रीस को अलग अलग मदद भी मुहैया करा सकता है. लेकिन एक अथाह घड़े में कौन अपने पैसे फेंकना चाहेगा? अब तक तो कोई स्वेच्छा से आगे नहीं आया है.

यूरोजोन से निकलना ही एक उपाय

बैठक के दो दिन बाद तक तो ग्रीस को मुश्किल से बाहर निकाल लिया जाना चाहिए था. लेकिन नहीं, पता नहीं क्यों, कुछ भी फिट नहीं बैठ रहा. एथेंस की सरकार पर अब भरोसा नहीं किया जा सकता. तीसरे राहत पैकेज की शर्तें पूरी नहीं की जा रही, तात्कालिक वित्त सुनिश्चित नहीं किया जा रहा. और इसके बावजूद यूरो देशों की संसदें इसे मंजूरी दें? नहीं, यह नहीं चलेगा.

इसकी जगह यूरोजोन को ग्रीस के लिए बाहर निकलने का रास्ता तैयार करना चाहिए. ग्रीस और यूरोप की जनता के लिए यही सही होगा. यह सच है कि उम्मीद अंत तक जिंदा रहती है लेकिन कभी ना कभी तो वह मर भी जाती है ना. दुर्भाग्यवश वो घड़ी अब आ गयी है.

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