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खेल

गोएत्से यानी सुपर मारियो

"जाओ, दुनिया को दिखा दो कि तुम मेसी से बेहतर हो." इन्हीं शब्दों के साथ जर्मन कोच ने मारियो गोएत्से को मैदान पर भेजा. कई मैचों में बेंच पर बैठे गोएत्से ने फाइनल जीता कर साबित कर दिया कि वो भी खेल का खूबसूरत कोहिनूर हैं.

फुटबॉलर में जिमनास्ट जैसी लचक और बिजली जैसा तेज वार देखना हो तो मारियो गोएत्से को याद कीजिए. एक ऐसे वक्त में जब खेल में ड्रिबलिंग, फ्री किक, टाइट शॉट और कॉर्नर एक्सपर्टों का बोलबाला हो, तभी 22 साल के गोएत्से साबित कर देते हैं कि खूबसूरत खेल का एक और कोना है.

सेमीफाइनल में जब जर्मनी ब्राजील को धो रहा था तब भी गोएत्से मैदान पर नहीं बल्कि बारी के इंतजार में बेंच पर बैठे थे. क्वार्टर फाइनल और सेमीफाइनल जैसे अहम मुकाबलों में गोएत्से मैदान पर अतिरिक्त खिलाड़ी के तौर पर उतरे. असल में गोएत्से की जगह दिग्गज स्ट्राइकर मिरोस्लाव क्लोजे और थोमस मुलर को तरजीह दी जा रही थी. कहीं न कहीं बड़े मैचों में क्लोजे और मुलर का अनुभव भी काम आ रहा था.

लेकिन फाइनल में 88 मिनट तक जब कोई गोल नहीं हुआ और 36 साल के क्लोजे थकने से लगे तो कोच योआखिम लोएव ने गोएत्से को मैदान पर उतारा. इसके बाद की कहानी अगले दिन के अखबार भी बखूबी कहते हैं, "गोएत्से, द गॉड."

गोएत्से की मुश्किल

असल में गोएत्से ने 22 साल की उम्र में ही तमाम उतार चढ़ाव देखे हैं. बीते साल तक उन्हें जर्मनी का सबसे बड़ा उभरता खिलाड़ी कहा जा रहा था. बोरुसिया डॉर्टमुंड को वो दो बुंडेसलीगा खिताब जीता चुके थे. बीते साल टीम चैंपियंस लीग के फाइनल में भी पहुंच गई थी. लेकिन इसके बाद भारी भरकम फीस चुका कर बायर्न म्यूनिख ने गोएत्से को खरीद लिया. यहीं से उन्होंने कठिन समय देखना शुरू किया. अपने खेल के विशेष तरीके की बदौलत गोएत्से बायर्न के साथ बहुत बढ़िया ढंग से फिट नहीं हो पाए.

फुटबॉल पैरों के साथ साथ दिमाग में भी खेला जाता है. इस लिहाज से बायर्न और गोएत्से की ट्यूनिंग बहुत शानदार नहीं हो पा रही है. गोएत्से जिन मौकों को गोल में तब्दील कर सकते हैं, बायर्न के बाकी खिलाड़ियों के लिए वो नामुमकिन हैं. ऐसी ही परेशानियों के बीच गोएत्से धीरे धीरे मैदान से ज्यादा समय बेंच पर बिताने लगे. धीरे धीरे वो भुलाए जाने लगे.

नहीं टूटा मनोबल

कई फैन्स तो यह भी कहने लगे कि गोएत्से को वापस डॉर्टमुंड आ जाना चाहिए. बायर्न में वह खत्म हो जाएंगे. लेकिन तभी वर्ल्ड कप आ गया और स्ट्राइकर के तौर पर कोच योआखिम लोएव गोएत्से को भी ब्राजील ले गए. घाना के खिलाफ उन्होंने बिजली जैसी रफ्तार से गोल भी किया. लेकिन बाद के मैचों में अनुभव के लिहाज से कमजोर गोएत्से को बेंच पर बैठना पड़ा. जर्मनी ने इससे पिछला वर्ल्ड कप 1990 में जीता था. तब गोएत्से पैदा भी नहीं हुए थे.

इतने युवा खिलाड़ी का बेंच पर बैठे बैठे मनोबल न टूटे, इसके लिए टीम के वरिष्ठ खिलाड़ियों ने बड़ी भूमिका निभाई. फाइनल के हाफ टाइम में मिरोस्लाव क्लोजे उनके पास आए. क्लोजे ने गोएत्से से कहा, "मुझे लगता है कि आज तुम गोल करोगे." इसके बाद 88वें मिनट में कोच ने गोएत्से से कहा, "जाओ, दुनिया को दिखा दो कि तुम मेसी से बेहतर हो."

इन सब वाहवाहियों के बीच गोएत्से साथी खिलाड़ियों और अपने परिवार का आभार जता रहे हैं, "मैं अपने परिवार और दोस्तों का आभारी हूं जिन्होंने मुझ पर भरोसा बनाए रखा. कुछ और खिलाड़ी भी मेरे पास आए और उन्होंने मुझसे कहा आज रात तुम काम पूरा कर दोगे. पूरी टीम ने अच्छा खेल दिखाया और अच्छी बात हुई कि उसमें मेरी भागीदारी भी थी."

दुनिया भर में गोएत्से

दुनिया भर के अखबारों ने गोएत्से की जमकर तारीफ की है. फुटबॉल में जर्मनी के कट्टर प्रतिद्वंद्वी नीदरलैंड्स के अखबार डे टेलेग्राफ ने कहा, "सुपर मारियो, मारियो मेसी से भी मजबूत है."

मेक्सिको के अखबार अल यूनिवर्सल ने भी गोएत्से पर फोकस किया, "एक परफेक्ट शॉट. कला का नमूना, इस गोल का सपना मारियो गोएत्से पूरी जिंदगी देखेंगे." अद्भुत प्रतिभा तमाम मुश्किलों से बाहर आ चुकी है. 22 साल की उम्र कहती है कि अभी तो गोएत्से का गोल्डन टाइम बाकी है.

ओएसजे/एमजे (रायटर्स, डीपीए)

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