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मंथन

गैर्स्ट के लिए आसमान सीमा नहीं

जर्मनी से पहले अंतरिक्ष यात्री अलेक्जांडर गैर्स्ट अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन आईएसएस पर जाने वाले है. उनकी उड़ान मई में तय है.

धरती से 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर बसाया गया अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन और अंतरिक्ष में जाने का सपना. अब मई में अलेक्जांडर का यह सपना पूरा होने जा रहा है. साल 2000 में बने इस स्टेशन पर लगातार अंतरिक्ष यात्री काम कर रहे हैं.

अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन धरती से 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर है. यह अपनी कक्षा में चक्कर काट रहा है. पिछले चौदह साल से अंतरिक्ष यात्री यहां काम कर रहे हैं. गैर्स्ट कहते हैं, "आज अंतरिक्ष में जाना वैसा ही है जैसा पहले लोग सोचते थे कि क्षितिज के पार क्या है... और फिर वे जहाज लेकर निकल पड़ते, कुछ नया खोजने. हम इंसान खोज करने वाली प्रजाति हैं."

लगातार अभ्यास

ट्रेनिंग का एक हिस्सा टेक्सास के ह्यूस्टन स्पेस सेंटर में किया गया. बार बार प्रैक्टिस जरूरी है ताकि हर पकड़ पक्की हो जाए. ट्रेनिंग लगभग चार साल से चल रही है. पूरी तरह अंतरिक्ष सूट में. अपने अनुभव के बारे में गैर्स्ट बताते हैं, "यह बहुत थकाने वाली ट्रेनिंग है. स्पेस सूट में लगातार छह सात घंटे, इसमें प्रेशर होता है. क्योंकि अंतरिक्ष में आपको वैक्यूम में जीना है. मतलब अंदरूनी दबाव हमारे वातावरण का एक तिहाई है. यानी हर हलचल ऐसी है जैसे टेनिस बॉल को दबा दिया गया हो. तो आप सोच सकते हैं कि अगर इस स्थिति में आप लगातार सात घंटे रहें, तो यह बहुत थका देता है."

मास्टर ऑफ ऑल

स्पेस स्टेशन पर अंतरिक्ष यात्री रिसर्चर और तकनीकी एक्सपर्ट भी होते हैं. उन्हें स्टेशन की देख रेख और रिसर्च करनी होती है. अंतरिक्ष पर नजर के साथ ही इस बता का भी ध्यान रखना होता है कि धरती के लिए क्या जरूरी है. इसके लिए भारहीनता में कई पदार्थों की टेस्टिंग की जाती है. अंतरिक्ष यात्रियों को सिर्फ अंतरिक्ष का ही एक्सपर्ट नहीं होना चाहिए, और भी बहुत जानकारी होनी चाहिए, "आईएसएस यानी अंतरिक्ष स्पेस स्टेशन में यात्री खुद वैज्ञानिक नहीं होते, बल्कि वे धरती पर वैज्ञानिकों की मदद करते हैं. अंतरिक्ष में होने वाला हर प्रयोग धरती वाली टीम के साथ मिल कर होता है. मतलब सिर्फ मेरे विषय भू भौतिकी का रिसर्च से लेना देना नहीं है."

37 साल के अलेक्जांडर अंतरिक्ष यात्री बनने से पहले ज्वालामुखी पर रिसर्च कर रहे थे. अब वह उन सवालों के बारे में सोचेंगे, जो मार्स मिशन के लिए जरूरी है. अंतरिक्ष का सपना सिर्फ आईएसएस पर जा कर पूरा नहीं होगा, "मुझे लगता है कि हर अंतरिक्ष यात्री का सपना और दूर जाना होता है, चांद पर किसी क्षुद्रग्रह से होते हुए मंगल तक. हम मंगल तक पहुंच सकते हैं. ये हमें अपने बारे काफी कुछ बता सकता है. अगर हम इसके वातावरण को देखें तो पाते हैं कि पहले यहां जीवन था, सतह पर बहता पानी था. अब यहां रेगिस्तान है. हम कैसे धरती का ऐसा हाल होने से बचा सकते हैं."

यात्रा मई में शुरू होने वाली है. सोयूज रॉकेट उन्हें अंतरिक्ष स्टेशन तक पहुंचाएगा. फिर छह महीने तक वह अंतरराष्ट्रीय टीम में शामिल रहेंगे.

रिपोर्टः आभा मोंढे

संपादनः ईशा भाटिया

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