1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

विज्ञान

गेंडों का बेदर्दी से शिकार

बीस साल में मारे गए गेंडों की संख्या 100 थी लेकिन 2011 में ऐसा क्या हुआ कि एक साल के भीतर 50 गेंडे मारे गए. क्या अब लोगों को अपनी जान गंवाने का डर भी नहीं रोक पा रहा है? आखिर ऐसा क्या लालच है?

भारत के पूर्वी प्रांत असम में बेदर्दी से गेंडे मारे जा रहे हैं. करीब एक साल पहले संरक्षणकर्ताओं के अनुमान के अनुसार दुनिया में 3,200 गेंडे भारत में थे. इनमें से ज्यादातर भारत और नेपाल के सुरक्षित पार्कों में थे. लेकिन 2012 में कई कारणों से इनकी संख्या में भारी कमी आई है जिसमें एक बड़ी वजह सींघ के लिए हुआ इनका शिकार भी है. पशु प्रेमियों में इस बात को लेकर चिंता बढ़ गई है.

यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट की रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल 18 गेंडे काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में और 4 पोबित्रा, औरंग और मानस राष्ट्रीय उद्यानों में मारे गए. असम के यह 4 राष्ट्रीय उद्यान 80 फीसदी गेंडों के संरक्षण घर हैं. इसके अलावा 30 गेंडे मानसून के दौरान बाढ़ की भेंट चढ़ गए.

सींघों के लिए

काजीरंगा उद्यान के प्रबंधक निरंजन कुमार ने डॉयचे वेले को बताया कि पिछले साल गेंडों की हत्या और दूसरे कारणों से उनकी मृत्यु की संख्या वाकई असामान्य रूप से अधिक थी. उन्होंने माना कि सींघों के लालच में जानवरों को मारने वाले तस्करों से जानवरों को बड़ा खतरा है. निरंजन कुमार ने कहा, "ये शिकारी जानवरों को बड़ी चतुराई से मारते हैं. मारने के बाद मिनटों में वे सींघ निकाल कर फरार हो जाते हैं."

कुमार आगे कहते हैं, "कई बार बंदूक की आवाज सुनकर हमारे आदमी मौके पर पहुंच जाते हैं. ऐसे में वे सींग तो नहीं उखाड़ पाते हैं लेकिन तब तक गेंडा मर चुका होता है और वह नुकसान हो चुका होता है जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती."

Krugersdorp Südafrika

किस बात का लालच

गैर कानूनी घटकों से दवाइयां बनाने में चीन बहुत आगे है. गेंडों के सींघ सम्पीड़ित बालों से बने होते हैं. वे एक पारंपरिक चीनी दवाई बनाने के काम आते हैं. इस दवाई का इस्तेमाल कैंसर और आर्थराइटिस जैसे और भी रोगों के इलाज में होता है. हालांकि गेंडों की सींघ का इस्तेमाल इन दवाइयों में अब कानूनी तौर पर उचित नहीं है फिर भी इसका इस्तेमाल जारी है. कुछ लोग कई बार घरों में इन सींघों को केवल शान बढ़ाने के उद्देश्य से भी सजा लेते हैं.

1980 से सींघों के व्यापार पर अंतर्राष्ट्रीय बैन लग गया है. फिर भी इनके ऊंचे दाम का लालच अभी भी शिकारियों को गेंडे मारने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. सींघों की सबसे भारी मांग चीन और वियतनाम में है. भारत के वन्य जीव विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार एक औसत लम्बाई की सींघ के लिए लोग वहां 75,000 यूरो तक की कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं.

संरक्षण और नतीजे

19वीं शताब्दी से लेकर 20वीं शताब्दी के मध्य तक गेंडों की संख्या में भारी कमी आई थी. इसके बाद 1954 में गेंडों के संरक्षण के लिए असम में राज्य सरकार ने 'असम बिल' पारित किया जिसके तहत गेंडे के शिकार पर जुर्माना लगाया गया. पिछले कुछ दशकों में इस कानून के चलते शिकार में काफी कमी आई. 2011 तक भारत में गेंडों की तादाद बढ़ कर 2,650 हो गई जो कि 1950 में मात्र 200 ही रह गई थी. गेंडों के संरक्षण में उठाए गए इस कदम की दुनिया भर में प्रशंसा भी हुई. इससे अगर तुलना करें तो एक साल में करीब 50 गेंडों का मारा जाना काफी झटका देने वाली बात है.

पशु संरक्षण विशेषज्ञ दिपांकर घोश कहते हैं, "असम में 2001 से 2011 के बीच कुल 78 गेंडे मरे थे. अब केवल एक साल के अंदर ही इतनी मौतें निश्चित ही चिंता की बात है." घोश ने आगे कहा कि गेंडों के संरक्षण के बेहतर उपाय बेहद जरूरी हैं ताकि इस समस्या को यहीं काबू में किया जा सके.

शिकार सबसे बड़ा खतरा

घोश ने डॉयचे वेले से बातचीत में आगे कहा कि शिकार और तस्करी के मामलों से जूझना सबसे बड़ी चुनौती है. गेंड़ों को मारने वालों में प्रमुख रूप से असम के कुछ अपराधी गुट हैं. इसमें कई अंतर्राष्ट्रीय गुटों का भी हाथ है जो क्षेत्रीय शिकारियों से ये काम करवाते हैं. इन शिकारियों के पास बेहद सटीक औजार होते हैं. इनसे लड़ने के लिए कई बार सुरक्षाकर्मियों को मौके पर ही गोली चलाने के आदेश भी होते हैं. पिछले 20 सालों में शिकार के दौरान सुरक्षाकर्मियों की गोली से लगभग 100 से शिकारी जान भी गंवा चुके हैं.

असम में गेंडों के बढ़ रहे शिकार की घटना को लेकर मुख्यमंत्री तरुन गोगोई ने आर्मी को भी काजीरंगा की घेरेबंदी के लिए तैनात करने का फैसला किया जिससे कि आसपास के आदिवासियों को शिकार से रोका जा सके. असम के वन्य जीव अधिकारियों ने पिछले महीने मीडिया को बताया कि जरूरत पड़ने पर अपराधियों को पकड़ने के लिए वे ड्रोन कैमरों और सैटेलाइट की मदद भी ले सकते हैं.

रिपोर्ट: शेख अजीजुर रहमान (कोलकाता)/एसएफ

संपादन: ईशा भाटिया

DW.COM

WWW-Links

संबंधित सामग्री