गूगल पर गलत रास्ता लेता ईयू | दुनिया | DW | 28.11.2014
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

गूगल पर गलत रास्ता लेता ईयू

यूरोपीय संसद के प्रस्ताव में जैसा कहा गया है उस तरह से क्या गूगल को तोड़ दिया जाना चाहिए? डीडबल्यू के यॉर्ग ब्रुंसमन का मानना है कि यह गलत रास्ता है. इंटरनेट कंपनी को छोटा करने से छोटी कंपनियां बड़ी नहीं हो जाएंगी.

यह बात यूरोपीय संसद तक भी पहुंच गई है कि गूगल अपनी प्रतियोगी कंपनियों को कोई मौका नहीं देता. और सांसद सही भी सोच रहे हैं. जो आज ऐसा सोचता है कि कोई सर्च इंजिन नक्शा या वीडियो बनाने का काम शुरू करना चाहे तो वह सीधे अपना पैसा खिड़की से बाहर फेंक दे. क्योंकि गूगल की दादागिरी के आगे किसी की नहीं चलती. लेकिन क्या इसके लिए हम गूगल को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं और उसे दो हिस्सों में बांटने की धमकी दे सकते हैं? नहीं. क्योंकि गूगल इसलिए इतना प्रभावशाली नहीं हुआ क्योंकि उसने अपनी प्रतिस्पर्धी कंपनियों को गलत तरीके से बाजार से बाहर किया हो. जो ऐसा कहता है उसने हालात को अच्छे से नहीं देखा.

हालांकि यह भी उतना ही सही है कि कंपनी बिलकुल निर्दोष भी नहीं है. और गूगल का पुराना वाक्य डोन्ट बी इविल (बुरे मत बनो) भी आज प्रभावशाली नहीं है. कंपनी ने अपनी संभावनाओं को हमेशा इस्तेमाल किया है. वह कंप्यूटर और स्मार्टफोन के बाजार में फैल गई है. और गूगल ग्लास जैसे चश्मे के साथ उसने ठोस संकेत दिए हैं. लेकिन गूगल कंपनी हमेशा प्रगतिशील रही है और गलत दिशा में जाने पर उसे इस बात से भी कोई डर नहीं रहा कि परिणाम क्या होंगे. और गूगल ने अपने प्रतिस्पर्धियों की तुलना में हमेशा अपने उपभोक्ताओं की इच्छा का ध्यान रखा. यही आज यूरोप के बाजार में उसकी 90 फीसदी हिस्सेदारी का आधार है.

DW Hintergrund Deutschland Jörg Brunsmann

यॉर्ग ब्रुंसमन

ईर्ष्या का कारण

गूगल अपने काम के कारण आज अरबों में खेल रहा है और यह प्रतिस्पर्धी कंपनियों की ईर्ष्या का बड़ा कारण है और कि दूसरी कंपनियां राजनीति की मदद मांग रही हैं. यह गूगल के लिए एक ऐतिहासिक खुशकिस्मती का दिन है. शुरुआत में यह छात्रों की शुरू की एक कंपनी थी जो तेजी से बढ़ते इंटरनेट यूजरों को इंटरनेट से जोड़ना चाहती थी.

गूगल हमेशा सही समय पर सही कंसेप्ट के साथ सही जगह पर पहुंचा और इसी का फल उन्हें आज मिल रहा है. एक उपभोक्ता के तौर पर मेरे लिए भी. जब मैं इस सर्च इंजिन में कोई एड्रेस लिखता हूं, तो उन्मीद करता हूं कि पते के साथ ही आसपास की जानकारी वाला एक नक्शा भी मुझे मिलेगा. नक्शा और सैटेलाइट चित्र भी गूगल का हिस्सा हैं और एक क्लिक पर मुझे पूरी जानकारी मिल जाएगी, जो मैं तलाश कर रहा हूं. यह बहुत ही उपयोगी है. तो क्या मैं भी गूगल की दादागिरी पर आहें भरूं?

क्या इंटरनेट यूजर नासमझ हैं? नहीं. यूरोपीय सांसदों का यह निरिक्षण कि गूगल सर्च मशीन का वर्चस्व है, यह सही है लेकिन इस पर उन्होंने जो फैसला लिया है, वह सही नहीं है. सांसद ऐसे बर्ताव कर रहे हैं जैसे उन्हें याहू, बिंग या डकडरगो जैसे विकल्पों के बारे में पता ही नहीं है. क्या हम सच में इतने नासमझ और अक्षम हैं कि हम इन सर्च इंजिनों का इस्तेमाल नहीं कर सकते? मैं इन सभी सर्च इंजिनों के बारे में जानता हूं और बाकी कंपनियों के बारे में भी. लेकिन परिणाम यह है कि जो मुझे वहां मिलता है वह गूगल की तुलना में काफी खराब है. यही एक कारण है कि मैं गूगल से अभी तक जुड़ा हुआ हूं. हालांकि ऐसा भी नहीं है कि मैं जीवनभर इसी से जुड़ा रहूंगा. गूगल का प्रभुत्व ऊपर से नहीं आया है और हर विकल्प सिर्फ दो माउस क्लिक दूर है. लेकिन अगर यूरोपीय संघ गूगल को इसलिए छोटा करना चाहता है कि दूसरे बड़े दिखाई दें, तो यह गलत रास्ता है.

DW.COM

संबंधित सामग्री